श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 26

 
श्लोक
अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु ।
एतावान् पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
अथो—अत:; भजस्व—स्वीकार करो; माम्—मुझको; भद्र—हे महाशय; भजन्तीम्—सेवा करने के लिए इच्छुक; मे— मुझको; दयाम्—दया; कुरु—करो; एतावान्—इस तरह के; पौरुष:—किसी पुरुष के लिए; धर्म:—धर्म; यत्—वह; आर्तान्—आर्त को; अनुकम्पते—दयालु है ।.
 
अनुवाद
 
 काल कन्या ने आगे कहा : हे भद्र, मैं आपकी सेवा के लिए उपस्थित हूँ। कृपया मुझे स्वीकार करके मेरे ऊपर दया करें। पुरुष का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि दुखी व्यक्ति पर अनुकम्पा करे।
 
तात्पर्य
 यवनराज चाहता तो काल-कन्या को अस्वीकार कर देता, किन्तु उसने उसकी प्रार्थना पर विचार किया, क्योंकि यह नारद मुनि का आदेश था। इस तरह उसने काल-कन्या को भिन्न रूप में स्वीकार कर लिया। दूसरे शब्दों में, नारद मुनि के आदेश या भक्ति-पथ तीनों लोकों में प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा मान्य है और यवनराज के लिए तो विशेष रूप से। स्वयं भगवान् चैतन्य ने हर एक से संसार के प्रत्येक कोने-कोने
में प्रत्येक ग्राम तथा नगर में, भक्तियोग सम्प्रदाय का प्रचार करने के लिए कहा। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन के उपदेशकों ने सचमुच अनुभव किया है कि नारद मुनि की पाञ्चरात्रिका विधि के बल पर यवनों तथा म्लेच्छों तक ने आध्यात्मिक जीवन स्वीकार किया है। जब मानव जाति चैतन्य महाप्रभु द्वारा बताई गई शिष्य-परम्परा का पालन करेगी तो संसार भर के लोग इससे लाभान्वित होंगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥