श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  » 

 
 
श्लोक 1:  नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा प्राचीनबर्हिषत्, तत्पश्चात् यवनराज साक्षात् भय, प्रज्वार, काल-कन्या तथा अपने सैनिकों सहित सारे संसार में विचरने लगा।
 
श्लोक 2:  एक बार इन भयानक सैनिकों ने पुरञ्जन-नगरी पर बड़े वेग से आक्रमण किया। यद्यपि यह नगरी भोग की सारी सामग्री से परिपूर्ण थी, किन्तु इसकी रखवाली एक बूढ़ा सर्प कर रहा था।
 
श्लोक 3:  धीरे-धीरे कालकन्या ने घातक सैनिकों की सहायता से पुरञ्जन की नगरी के समस्त वासियों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें सभी प्रकार से निकम्मा बना दिया।
 
श्लोक 4:  जब कालकन्या ने शरीर पर आक्रमण किया, तो यवनराज के घातक सैनिक विभिन्न द्वारों से नगरी में घुस आये। फिर वे सभी नागरिकों को अत्यधिक कष्ट देने लगे।
 
श्लोक 5:  जब इस प्रकार वह नगरी सैनिकों तथा कालकन्या के द्वारा विपदाग्रस्त हो गई तो अपने परिवार की ममता में लिप्त राजा पुरञ्जन यवनराज तथा काल-कन्या के आक्रमण से संकट में पड़ गया।
 
श्लोक 6:  कालकन्या द्वारा आलिंगन किए जाने से धीरे-धीरे राजा पुरञ्जन का सारा शारीरिक सौंदर्य जाता रहा। अत्यधिक विषयासक्त होने से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसका सारा ऐश्वर्य नष्ट हो गया। सभी कुछ खो जाने पर गन्धर्वों तथा यवनों ने उसे बलपूर्वक जीत लिया।
 
श्लोक 7:  तब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई है और उसके पुत्र, पौत्र, नौकर तथा मंत्री सभी क्रमश: उसके विरोधी बनते जा रहे हैं। उसने यह भी देखा कि उसकी पत्नी स्नेहशून्य एवं अन्यमनस्क हो रही है।
 
श्लोक 8:  जब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसके परिवार के समस्त प्राणी, उसके सम्बन्धी, अनुचर, दास, मंत्री तथा अन्य सभी उसके विरुद्ध हो गये हैं, तो वह अत्यन्त चिन्तित हुआ। किन्तु उसे इस स्थिति से छूटने का कोई उपाय न दिखाई दिया, क्योंकि वह कालकन्या द्वारा बुरी तरह परास्त कर दिया गया था।
 
श्लोक 9:  कालकन्या के प्रभाव से विषयभोग की सारी वस्तुएँ बासी पड़ गई थीं। अपनी कामेच्छाओं के बने रहने के कारण राजा पुरञ्जन अत्यन्त दीन बन चुका था। उसे अपने जीवन-लक्ष्य का भी पता न था। वह अब भी अपनी पत्नी तथा बच्चों के प्रति अत्यन्त आसक्त था और उनके पालन के सम्बन्ध में चिन्तित था।
 
श्लोक 10:  राजा पुरञ्जन की नगरी गन्धर्व तथा यवन सैनिकों द्वारा जीत ली गई और यद्यपि राजा इस नगरी को त्यागना नहीं चाहता था, किन्तु परिस्थितिवश उसे ऐसा करना पड़ा, क्योंकि कालकन्या ने उसे कुचल दिया था।
 
श्लोक 11:  ऐसी दशा में यवनराज के बड़े भाई प्रज्वार ने अपने छोटे भाई भय को प्रसन्न करने के लिए नगरी में आग लगा दी।
 
श्लोक 12:  जब सारी नगरी जलने लगी तो सारे नागरिक तथा राजा के नौकर, उसके परिवार के सदस्य, पुत्र, पौत्र, पत्नियाँ तथा अन्य सम्बन्धी अग्नि की चपेट में आ गये। इस प्रकार राजा पुरञ्जन अत्यन्त दुखी हो गया।
 
श्लोक 13:  जब नगरी की रखवाली करने वाले सर्प ने देखा कि नागरिकों पर काल-कन्या का आक्रमण हो रहा है, तो वह यह देखकर अत्यन्त सन्तप्त हुआ कि यवनों ने आक्रमण करके उसके घर में आग लगा दी है।
 
श्लोक 14:  जिस प्रकार जंगल में आग लगने पर वृक्ष के कोटर में रहने वाला सर्प उस वृक्ष को छोडऩा चाहता है, उसी प्रकार वह नगर अधीक्षक सर्प भी अग्नि के प्रचण्ड ताप के कारण नगरी छोडऩे के लिए इच्छुक हो उठा।
 
श्लोक 15:  गन्धर्वों तथा यवन सैनिकों द्वारा उस सर्प के शरीर के अंग जर्जर कर दिए गए, क्योंकि उन्होंने उसकी शारीरिक शक्ति को परास्त कर दिया था। जब उसने शरीर त्यागना चाहा तो उसके शत्रुओं ने रोक लिया। अपने प्रयास में विफल होने के कारण वह जोर से चीत्कार करने लगा।
 
श्लोक 16:  तब राजा पुरञ्जन अपनी पुत्रियों, पुत्रों, पौत्रों, पुत्रवधुओं, जामाता, नौकरों तथा अन्य पार्षदों के साथ-साथ अपने घर, घर के सारे साज-सामान तथा जो कुछ भी सञ्चित धन था, उन सबके विषय में सोचने लगा।
 
श्लोक 17:  राजा पुरञ्जन अपने परिवार के प्रति तथा “मैं” और “मेरे” विचार में अत्यधिक आसक्त था। चूँकि वह अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक मोहित था, इसलिए वह पहले से दीन बन चुका था। वियोग के समय वह अत्यन्त दुखी हो गया।
 
श्लोक 18:  राजा पुरञ्जन अत्यन्त चिन्तित होकर सोचने लगा, “हाय! मेरी पत्नी इतने सारे बच्चों से परेशान होगी। जब मैं यह शरीर छोड़ दूँगा तो यह किस प्रकार परिवार के इन सभी सदस्यों का पालन करेगी? हाय! वह परिवार पालन के विचार से अत्यधिक कष्ट पाएगी।”
 
श्लोक 19:  राजा पुरञ्जन अपनी पत्नी के साथ अपने पुराने व्यवहारों को सोचने लगा। उसे याद आया कि उसकी पत्नी तब तक भोजन नहीं करती थी, जब तक वह स्वयं खा नहीं चुकता था; वह तब तक नहीं नहाती थी जब तक वह नहीं नहा लेता था और वह उस पर सदा इतनी अधिक अनुरक्त थी कि यदि वह कभी झिडक़ देता था और उस पर नाराज हो जाता था, तो वह मौन रहकर उसके दुर्व्यवहार को सह लेती थी।
 
श्लोक 20:  राजा पुरञ्जन सोचता रहा कि उसके मोहग्रस्त होने पर किस तरह उसकी पत्नी उसे अच्छी सलाह देती थी और उसके घर से बाहर चले जाने पर वह कितनी दुखी हो जाती थी। यद्यपि वह अनेक पुत्रों एवं वीरों की माता थी तो भी राजा को डर था कि वह गृहस्थी का भार नहीं ढो सकेगी।
 
श्लोक 21:  राजा पुरञ्जन आगे भी चिन्तित रहने लगा: “जब मैं इस संसार से चला जाऊँगा तो मेरे ऊपर पूर्णत: आश्रित पुत्र तथा पुत्रियाँ किस प्रकार अपना जीवन निर्वाह करेंगी? उनकी स्थिति जहाज में चढ़े हुए उन यात्रियों के समान है जिनका जहाज सागर के बीच में ही टूट जाता है।”
 
श्लोक 22:  यद्यपि राजा पुरञ्जन को अपनी पत्नी तथा बच्चों के भाग्य के विषय में पश्चात्ताप नहीं करना चाहिए था फिर भी उसने अपनी दीन बुद्धि के कारण ऐसा किया। उसी समय, भय नामक यवनराज उसे बन्दी करने के लिए तुरन्त निकट आ धमका।
 
श्लोक 23:  जब यवनगण राजा पुरञ्जन को पशु की भाँति बाँधकर उसे अपने स्थान को ले जाने लगे तो राजा के अनुचर अत्यन्त शोकाकुल हो उठे। उन्हें भी विलाप करते हुए राजा के साथ-साथ जाना पड़ा।
 
श्लोक 24:  वह सर्प भी, जिसे यवनराज के सैनिकों ने बन्दी बनाकर पहले ही नगरी के बाहर कर दिया था, अन्यों के साथ अपने स्वामी के पीछे-पीछे चलपड़ा। ज्योंही इन सबों ने नगरी को छोड़ दिया त्योंही वह नगरी तहस-नहस (ध्वस्त) होकर धूल में मिल गई।
 
श्लोक 25:  जब राजा पुरञ्जन शक्तिशाली यवन द्वारा बलपूर्वक घसीटा जा रहा था, तब भी अपनी निरी मूर्खता के कारण वह अपने मित्र तथा हितैषी परमात्मा का स्मरण नहीं कर सका।
 
श्लोक 26:  उस घोर निर्दयी राजा पुरञ्जन ने विविध यज्ञों में अनेक पशुओं का वध किया था। अब वे सारे पशु इस अवसर का लाभ उठाकर उसे अपने सींगों से बेधने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसे फरसों से टुकड़े-टुकड़े करके काटा जा रहा है।
 
श्लोक 27:  स्त्रियों की दूषित संगति के कारण जीवरूप राजा पुरञ्जन निरन्तर संसार के समस्त कष्टों को सहता है और अनेकानेक वर्षों तक समस्त प्रकार की स्मृति से शून्य होकर भौतिक जीवन के अंधकार क्षेत्र में पड़ा रहता है।
 
श्लोक 28:  चूँकि राजा पुरञ्जन ने अपनी पत्नी का स्मरण करते हुए अपने शरीर का त्याग किया था, अत: वह अगले जन्म में अच्छे कुल की एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री बनी। उसने राजा विदर्भ के घर में राजा की कन्या रूप में अगला जन्म लिया।
 
श्लोक 29:  यह निश्चय हुआ था कि राजा विदर्भ की कन्या वैदर्भी का विवाह अत्यन्त शक्तिशाली पुरुष मलयध्वज के साथ किया जाये जो पाण्डुदेश का रहने वाला था। उसने अन्य राजकुमारों को पराजित करके राजा विदर्भ की कन्या के साथ विवाह कर लिया।
 
श्लोक 30:  राजा मलयध्वज के एक पुत्री हुई जिसकी आँखें श्यामल थीं। उसके सात पुत्र भी हुए जो आगे चलकर द्रविड़ नामक देश के शासक बने। इस प्रकार उस देश में सात राजा हुए।
 
श्लोक 31:  हे राजा प्राचीनबर्हिषत्, मलयध्वज राजा के पुत्रों ने लाखों पुत्रों को जन्म दिया और ये सब एक मनु की अवधि के अन्त तक तथा उसके बाद भी सारे संसार का पालन करते रहे।
 
श्लोक 32:  भगवान् कृष्ण के परम भक्त मलयध्वज की पहली कन्या का विवाह अगस्त्य मुनि के साथ हुआ। उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम दृढच्युत था जिससे इध्मवाह नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
 
श्लोक 33:  इसके पश्चात् राजर्षि मलयध्वज ने अपना सारा राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। तब वे पूरे मनोयोग से भगवान् कृष्ण की पूजा करने के लिए कुलाचल नामक एकान्त स्थान में चले गये।
 
श्लोक 34:  जिस प्रकार रात्रि में चाँदनी चन्द्रमा का अनुसरण करती है, उसी तरह राजा मलयध्वज के कुलाचल जाते ही मादक नेत्रों वाली उसकी अनुरक्त पत्नी अपने घर, पुत्र के होते हुए भी समस्त भोगों को तिलांजलि देकर उसके साथ हो ली।
 
श्लोक 35-36:  कुलाचल प्रान्त में चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी तथा वटोदका नाम की तीन नदियाँ थीं। राजा मलयध्वज नित्य ही इन पवित्र नदियों में जाकर स्नान करता था। इस प्रकार उसने बाहर तथा अन्दर से अपने को पवित्र कर लिया था। वह स्नान करता और कन्द, बीज, पत्तियाँ, फूल, जड़ें, फल तथा घास खाता तथा जल पीता था। इस प्रकार वह कठिन तपस्या करने लगा। अन्त में वह अत्यन्त कृश कार्य हो गया।
 
श्लोक 37:  तपस्या के द्वारा राजा मलयध्वज धीरे-धीरे शरीर तथा मन से जाड़ा तथा गर्मी, सुख तथा दुख, वायु तथा वर्षा, भूख तथा प्यास, अच्छा तथा बुरा इन द्वैतभावों के प्रति समान दृष्टि वाला हो गया। इस प्रकार उसने सभी द्वन्द्वों पर विजय प्राप्त कर ली।
 
श्लोक 38:  पूजा से, तप साधना से तथा नियमों के पालन से राजा मलयध्वज ने अपनी इन्द्रियों, प्राण तथा चेतना को जीत लिया। इस प्रकार उसने हर वस्तु को परब्रह्म (कृष्ण) रूपी केन्द्रबिन्दु पर स्थिर कर लिया।
 
श्लोक 39:  इस प्रकार देवों की गणना के एक सौ वर्षों तक वे एक ही स्थान पर अचल बने रहे। इसके बाद उन्हें भगवान् कृष्ण के प्रति भक्तिमयी आसक्ति उत्पन्न हुई और वे उसी स्थिति में स्थिर रहे।
 
श्लोक 40:  आत्मा और परमात्मा में अन्तर कर सकने के कारण राजा मलयध्वज ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। आत्मा एक-स्थानिक है, जबकि परमात्मा सर्वव्यापी है। यह भौतिक देह आत्मा नहीं है, अपितु आत्मा इस भौतिक देह का साक्षी है—उन्हें इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो गया।
 
श्लोक 41:  इस प्रकार राजा मलयध्वज को पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई, क्योंकि शुद्ध अवस्था में उसे साक्षात् भगवान् ने उपदेश दिया था। ऐसे दिव्य ज्ञान के द्वारा वह प्रत्येक वस्तु को समस्त दृष्टिकोणों से समझ सकता था।
 
श्लोक 42:  इस प्रकार राजा मलयध्वज परमात्मा को अपने पास बैठा हुआ और स्वयं आत्मा रूप को परमात्मा के निकट बैठा हुआ देख सकता था। चूँकि वे दोनों साथ-साथ थे, अत: उनके स्वार्थों का भिन्न होना आवश्यक न था। इस प्रकार उसने ऐसे कार्य करने बन्द कर दिये।
 
श्लोक 43:  राजा विदर्भ की कन्या अपने पति को परमेश्वर रूप में सर्वेसर्वा मानती थी। उसने सारे इन्द्रिय-सुख त्याग दिये और पूर्णत: विरक्त होकर वह अपने परम ज्ञानी पति के सिद्धान्तों का पालन करने लगी। इस प्रकार वह उसकी सेवा में लगी रही।
 
श्लोक 44:  राजा विदर्भ की पुत्री पुराने वस्त्र पहनती थी। वह तपस्या के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गई थी। वह अपने बाल नहीं सँवारती थी जिससे उसमें लटें पड़ गई थीं। यद्यपि वह सदैव अपने पति के निकट रहती थी, किन्तु वह अत्यन्त मौन थी तथा अविचलित अग्नि की लपट के समान अक्षुब्ध (शान्त) थी।
 
श्लोक 45:  राजा विदर्भ की पुत्री सुस्थिर मुद्रा में आसन लगाये अपने पति की तब तक पूर्ववत् सेवा करती रही, जब तक उसे यह पता नहीं लग गया कि उसने इस शरीर से कूच कर दिया है।
 
श्लोक 46:  जब वह अपने पति के चरण दबा रही थी तो उसे अनुभव हुआ कि उसके पाँव अब गरम नहीं हैं, अत: वह समझ गई कि उसने पहले ही इस शरीर को त्याग दिया है। अकेली छूट जाने पर उसे अत्यधिक चिन्ता हुई। अपने पति के साथ से विरहित वह अपने को उस मृगी के समान अनुभव करने लगी जो अपने पति से बिछुड़ गई हो।
 
श्लोक 47:  जंगल में अकेली तथा विधवा जाने पर विदर्भ की पुत्री विलाप करने लगी; उसके आँसू निरन्तर झड़ रहे थे जिससे उसके स्तन भीग गये थे और वह जोर-जोर से रो रही थी।
 
श्लोक 48:  हे राजर्षि, उठिये, उठिये, देखिये, “जल से घिरी हुई यह पृथ्वी चोरों एवं तथाकथित राजाओं से भरी पड़ी है।” यह संसार अत्यधिक भयभीत है। आपका कर्तव्य है कि आप उसकी रक्षा करें।
 
श्लोक 49:  इस प्रकार वह परम आज्ञाकारिणी पत्नी अपने मृत पति के चरणों पर गिर पड़ी और उस एकान्त वन में करुण क्रन्दन करने लगी। उसकी आँखों से आँसू झर रहे थे।
 
श्लोक 50:  तब उसने लकडिय़ो से चिता बनाकर और अग्नि लगाकर उसमें अपने पति के शव को रख दिया। इस सबके बाद वह दारूण विलाप करने लगी और अपने पति के साथ अग्नि में भस्म होने के लिए स्वयं भी तैयार हो गयी।
 
श्लोक 51:  हे राजन्, एक ब्राह्मण, जो राजा पुरञ्जन का पुराना मित्र था उस स्थान पर आया और रानी को मृदुल वाणी से सान्त्वना देने लगा।
 
श्लोक 52:  ब्राह्मण ने इस प्रकार पूछा: तुम कौन हो? तुम किसकी पत्नी या पुत्री हो? यहाँ लेटा हुआ पुरुष कौन है? ऐसा प्रतीत होता है कि तुम इस मृत शरीर के लिए विलाप कर रही हो। क्या तुम मुझे नहीं पहचानती हो? मैं तुम्हारा शाश्वत सखा हूँ। तुम्हें स्मरण होगा कि पहले तुमने मुझसे कई बार परामर्श किया है।
 
श्लोक 53:  ब्राह्मण ने आगे कहा : हे मित्र, यद्यपि इस समय तुम मुझे तुरन्त नहीं पहचान सकते हो, किन्तु क्या तुम्हें स्मरण नहीं है कि भूतकाल में तुम मेरे अन्तरंग मित्र थे? दुर्भाग्यवश तुमने मेरा साथ छोड़ कर इस भौतिक जगत के भोक्ता का पद स्वीकार किया था।
 
श्लोक 54:  हे मित्र, मैं और तुम दोनों हंसों के तुल्य हैं। हम एक ही मानसरोवर रूपी हृदय में साथ-साथ रहते हैं, यद्यपि हम हजारों वर्षों से साथ साथ रह रहे हैं। किन्तु फिर भी हम अपने मूल निवास से बहुत दूर हैं।
 
श्लोक 55:  हे मित्र, तुम मेरे वही मित्र हो। जबसे तुमने मुझे छोड़ा है, तुम अधिकाधिक भौतिकतावादी हो गये हो और मेरी ओर न देख कर तुम इस संसार में, जिसे किसी स्त्री ने निर्मित किया है, विभिन्न रूपों में घूमते रहे हो।
 
श्लोक 56:  उस नगर (शरीर) में पाँच उद्यान, नौ द्वार, एक पालक (रक्षक), तीन कमरे, छह परिवार, पाँच बाजार, पाँच तत्त्व तथा एक स्त्री है, जो घर की स्वामिनी है।
 
श्लोक 57:  हे मित्र, पाँच उद्यान पाँच प्रकार के इन्द्रियसुख के विषय हैं और इसका रखवाला प्राण है, जो नौ द्वारों से आता जाता है। तीन प्रकोष्ठ तीन प्रमुख अवयव—अग्नि, जल तथा पृथ्वी—हैं। मन समेत पाँचों इन्द्रियों का समुच्चय इसके छह परिवार हैं।
 
श्लोक 58:  पाँच बाजार पाँचों कर्मेन्द्रियाँ हैं। वे पाँच शाश्वत तत्त्वों की संयुक्त शक्ति से अपना व्यापार करती हैं। इस सारी कर्मठता के पीछे आत्मा काम करता है। आत्मा पुरुष है और वही वास्तविक भोक्ता है। किन्तु इस समय शरीर रूपी नगर के भीतर छिपा होने के कारण वह ज्ञानशून्य है।
 
श्लोक 59:  हे मित्र, जब तुम भौतिक इच्छा रूपी स्त्री के साथ ऐसे शरीर में प्रवेश करते हो तो तुम इन्द्रियसुख में अत्यधिक लिप्त हो जाते हो। इसीलिए तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन भूल गया है। अपनी भौतिक अवधारणाओं के कारण तुम्हें नाना कष्ट उठाने पड़ रहे हैं।
 
श्लोक 60:  वास्तव में न तो तुम विदर्भ की पुत्री हो और न यह पुरुष (मलयध्वज) तुम्हारा हितेच्छु पति है। न ही तुम पुरञ्जनी के वास्तविक पति थे। तुम तो इस नव द्वार वाले शरीर में केवल बन्दी थे।
 
श्लोक 61:  तुम कभी अपने को पुरुष, कभी सती स्त्री और कभी नपुंसक मानते हो। यह सब शरीर के कारण है, जो माया द्वारा उत्पन्न है। यह माया मेरी शक्ति है और वास्तव में हम दोनों—तुम और मैं—विशुद्ध आध्यात्मिक स्वरूप हैं। तुम इसे समझने का प्रयास करो। मैं वास्तविक स्थिति बताने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
 
श्लोक 62:  हे मित्र, मैं परमात्मा और तुम आत्मा होकर भी हम गुणों में भिन्न नहीं हैं, क्योंकि हम दोनों आध्यात्मिक हैं। वास्तव में, हे मित्र, तुम मुझसे अपनी स्वाभाविक स्थिति में भी गुणात्मक रूप से भिन्न नहीं हो। तुम इस विषय पर तनिक विचार करो। जो वास्तव में महान् विद्वान् हैं और जिन्हें ज्ञान है वे तुममें तथा मुझमें कोई गुणात्मक अन्तर नहीं पाते।
 
श्लोक 63:  जिस प्रकार मनुष्य अपने शरीर के प्रतिबिम्ब को दर्पण में अपने से अभिन्न देखता है जब कि दूसरे लोग वास्तव में दो शरीर देखते हैं, उसी प्रकार अपनी इस भौतिक अवस्था में जिसमें जीव प्रभावित होकर भी प्रभावित नहीं होता, ईश्वर तथा जीव में अन्तर होता है।
 
श्लोक 64:  इस प्रकार दोनों हंस हृदय में एकसाथ रहते हैं। जब एक हंस दूसरे को उपदेश देता है, तो वह अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहता है। इसका अर्थ है कि वह अपनी मूल कृष्णचेतना को प्राप्त कर लेता है, जिसे उसने भौतिक आसक्ति के कारण खो दिया था।
 
श्लोक 65:  हे राजा प्राचीनबर्हि, समस्त कारणों के कारण भगवान् परोक्ष रूप से समझे जाने के लिए सुविख्यात हैं। इस प्रकार मैने तुमसे पुरञ्जन की कथा कही। वास्तव में यह आत्म-साक्षात्कार के लिए उपदेश है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥