श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 1

 
श्लोक
नारद उवाच
सैनिका भयनाम्नो ये बर्हिष्मन् दिष्टकारिण: ।
प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; सैनिका:—सैनिक; भय-नाम्न:—भय के; ये—जो; बर्हिष्मन्—हे राजा प्राचीनबर्हिषत्; दिष्ट-कारिण:—काल की आज्ञा के पालक; प्रज्वार—प्रज्वार; काल-कन्याभ्याम्—तथा कालकन्या सहित; विचेरु:—घूमने लगे; अवनीम्—पृथ्वी पर; इमाम्—इस ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा प्राचीनबर्हिषत्, तत्पश्चात् यवनराज साक्षात् भय, प्रज्वार, काल-कन्या तथा अपने सैनिकों सहित सारे संसार में विचरने लगा।
 
तात्पर्य
 मृत्यु के पूर्व की जीवन-अवस्था अत्यन्त भयावह होती है, क्योंकि प्राय: इसी में निर्बलता तथा अनेक रोगों का शिकार बनना पड़ता है। शरीर पर आक्रमण करने वाले रोगों की तुलना यहाँ पर सैनिकों से की गई है। ये सैनिक भी कोई साधारण सैनिक नहीं, इनका संचालन यवनराज करता है। दिष्ट-कारिण: शब्द सूचित
करता है कि वह उनका संचालक है। जब मनुष्य जवान होता है, तो वह बुढ़ापे की परवाह नहीं करता और मन-भर कर स्त्री-संभोग करता है, जिससे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। तब तो वह मृत्यु को बुलाने लगता है। जो मनुष्य युवावस्था में जितना ही स्त्री-संभोग करता है, वह बुढ़ापे में उतना ही कष्ट पाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥