श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 28

 
श्लोक
तामेव मनसा गृह्णन् बभूव प्रमदोत्तमा ।
अनन्तरं विदर्भस्य राजसिंहस्य वेश्मनि ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उसके; एव—निश्चय ही; मनसा—मन से; गृह्णन्—स्वीकार करते हुए; बभूव—हो गया; प्रमदा—स्त्री; उत्तमा—कुलीन; अनन्तरम्—मृत्यु के पश्चात्; विदर्भस्य—विदर्भ के; राज-सिंहस्य—अत्यन्त शक्तिशाली राजा के; वेश्मनि—घर में ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि राजा पुरञ्जन ने अपनी पत्नी का स्मरण करते हुए अपने शरीर का त्याग किया था, अत: वह अगले जन्म में अच्छे कुल की एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री बनी। उसने राजा विदर्भ के घर में राजा की कन्या रूप में अगला जन्म लिया।
 
तात्पर्य
 चूँकि राजा पुरञ्जन अपनी मृत्यु के समय अपनी पत्नी का स्मरण कर रहा था, इसलिए उसे अगले जन्म में स्त्री का शरीर प्राप्त हुआ। भगवद्गीता के निम्न श्लोक से (८.६) इसकी पुष्टि होती है—
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ॥

“मनुष्य शरीर त्यागने समय जिस अवस्था का स्मरण करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त करता है।” जब कोई जीव किसी विशेष बात के विषय में सोचने का आदी हो जाता है या किसी विचार में मग्न रहता है, तो मृत्यु के समय वह उसके विषय में अवश्य सोचता है। मृत्यु के समय वह जागृतावस्था में, स्वप्न में या सुषुप्तावस्था में जो कुछ देखे रहता है उसका स्मरण करता है। परमेश्वर की संगति छूटने के बाद जीव एक देह से दूसरे में प्रकृति के नियमानुसार तब तक देहान्तर करता रहता है जब तक उसे मनुष्य की देह प्राप्त नहीं हो जाती। यदि वह भौतिक विचारों में मग्न रहता है और आध्यात्मिक जीवन से अपरिचित रहता है तथा भगवान् गोविन्द की शरण ग्रहण नहीं करता जिनके हाथ में जन्म और मृत्यु की समस्याओं का समाधान है, तो वह अगले जन्म में स्त्री बनता है, विशेषकर यदि वह मृत्यु के समय अपनी पत्नी का स्मरण करता है। श्रीमद्भागवत (३.३१.१) में कहा गया है— कर्मणा दैवनेत्रेण। जीव पुण्य तथा पाप दोनों करता है। इन सबका लेखा-जोखा करने के बाद उसके वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जीव को नया शरीर मिलता है। यद्यपि राजा पुरञ्जन अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्त था, किन्तु तो भी उसने अनेक पुण्यकर्म किये थे। फलस्वरूप यद्यपि उसने स्त्री का स्वरूप प्राप्त किया, किन्तु उसे शक्तिशाली राजा की कन्या बनने का अवसर प्रदान किया गया। इसकी पुष्टि भगवद्गीता से (६.४१) होती है—

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा:।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥

“असफल योगी अनेकानेक वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोक में सुख भोगकर किसी पुण्य परिवार अथवा धनवान परिवार में जन्म लेता है।”

यदि कोई मनुष्य सकाम कर्मों में आसक्त रहने या योग के कारण भक्तियोग के पथ से भ्रष्ट होता है, तो उसे उच्च कुल में जन्म लेने का अवसर प्रदान किया जाता है। इस प्रकार भगवान् द्वारा नियुक्त उच्चाधिकारी जीव की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए पूर्ण न्याय बरतते हैं। यद्यपि राजा पुरञ्जन अपनी पत्नी के विचारों में डूबा रहने के कारण स्त्री बना, किन्तु पूर्व पुण्यों के कारण उनका जन्म राजपरिवार में हुआ। तात्पर्य यह है कि दूसरा शरीर प्रदान किये जाते समय हमारे समस्त कर्मों का मूल्यांकन किया जाता है। इसीलिए नारद मुनि ने व्यासदेव को उपदेश दिया कि मनुष्य को अन्य सारे वृत्तिपरक कर्मों (धर्मों) को त्याग कर केवल कृष्णभक्ति करनी चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण ने भी यही उपदेश दिया। यद्यपि मनुष्य आध्यात्मिक चेतना के पथ से च्युत हो सकता है, किन्तु फिर भी वह किसी भक्त या धनी के घर में मनुष्य रूप में जन्म प्राप्त करेगा। इस प्रकार से वह मनुष्य अपनी भक्ति को फिर से चालू कर सकता है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥