श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 3

 
श्लोक
कालकन्यापि बुभुजे पुरञ्जनपुरं बलात् ।
ययाभिभूत: पुरुष: सद्यो नि:सारतामियात् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
काल-कन्या—काल की पुत्री ने; अपि—भी; बुभुजे—अधिकार कर लिया; पुरञ्जन-पुरम्—पुरञ्जन की नगरी पर; बलात्— बलपूर्वक; यया—जिसके द्वारा; अभिभूत:—चंगुल में फँसकर; पुरुष:—मनुष्य; सद्य:—तुरन्त; नि:सारताम्—निकम्मापन; इयात्—प्राप्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 धीरे-धीरे कालकन्या ने घातक सैनिकों की सहायता से पुरञ्जन की नगरी के समस्त वासियों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें सभी प्रकार से निकम्मा बना दिया।
 
तात्पर्य
 जीवन के अन्त समय जब मनुष्य पर बुढ़ापे का आक्रमण होता है, तो उसका शरीर किसी काम के लायक नहीं रह जाता। इसीलिए वैदिक शिक्षा कहती है कि मनुष्य बचपन में बह्मचर्य का अभ्यास करे अर्थात् वह पूर्ण रूप से भगवान् की सेवा में लगा रहे और स्त्रियों से किसी प्रकार का सम्पर्क न रखे। जब बालक बड़ा होता है और २०-२५ वर्ष का होता है, तो उसका विवाह होता है। समय से विवाह होने पर तुरन्त ही उसके स्वस्थ तथा हृष्ट-पुष्ट बच्चे उत्पन्न होते हैं। इस समय लड़कियों की संख्या बढ़ रही है, क्योंकि तरुण लोग संभोग के मामले में निर्बल हैं। लडक़ा (पुत्र) तभी उत्पन्न हो सकता है जब पुरुष का वीर्य स्त्री से प्रबल हो और यदि स्त्री प्रबल हुई तो लडक़ी उत्पन्न होती है।
अत: यदि कोई विवाह के बाद पुत्र की उत्पत्ति चाहता है, तो उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। पचास वर्ष की आयु प्राप्त होते ही मनुष्य को गृहस्थ जीवन का परित्याग कर देना चाहिए। उस समय तक पुत्र को बड़ा हो जाना चाहिए जिससे परिवार का सारा उत्तरदायित्व उसे सौंपा जा सके। तब पति पत्नी को विरक्त जीवन बिताने के लिए दूर-दूर तीर्थस्थलों की यात्रा करनी चाहिए। जब पति-पत्नी घर तथा परिवार से विरक्त हो जाते हैं, तो पत्नी अपनी प्रौढ़ सन्तानों के संरक्षण में रहने के लिए घर वापस लौट आती है और गृहस्थी के कार्यों से अलग रहती है। तब पति भगवान् की कुछ सेवा करने के उद्देश्य से संन्यास ले लेता है।

यह सभ्यता की पूर्ण पद्धति है। मनुष्य-जीवन विशेष रूप से ईश्वर-साक्षात्कार के लिए है। यदि कोई जीवन के प्रारम्भ से कृष्णभक्ति नहीं करता तो जीवन के अन्त में उसे स्वीकार कराने का अभ्यास कराना चाहिए। दुर्भाग्यवश न तो बचपन में ऐसी शिक्षा का कोई प्रबन्ध है और न अन्तिम काल में ही कोई अपना परिवार छोड़ पाता है। ऐसी स्थिति है पुरञ्जन की नगरी इस देह की।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥