श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 39

 
श्लोक
आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिर: ।
वासुदेवे भगवति नान्यद्वेदोद्वहन् रतिम् ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
आस्ते—रहे आये; स्थाणु:—अचल; इव—सदृश; एकत्र—एक स्थान पर; दिव्यम्—देवताओं के; वर्ष—वर्ष; शतम्—एक सौ; स्थिर:—स्थिर; वासुदेवे—भगवान् कृष्ण पर; भगवति—भगवान्; न—नहीं; अन्यत्—अन्य कुछ; वेद—जान पाये; उद्वहन्—रखते हुए; रतिम्—आसक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार देवों की गणना के एक सौ वर्षों तक वे एक ही स्थान पर अचल बने रहे। इसके बाद उन्हें भगवान् कृष्ण के प्रति भक्तिमयी आसक्ति उत्पन्न हुई और वे उसी स्थिति में स्थिर रहे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.१९) में कहा गया है—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

“अनेक जन्म-जन्मांतरों के बाद जिसे वास्तव में ज्ञान होता है, वह मुझे समस्त करणों का कारण मानकर मेरी शरण में आता है और मुझी को सब कुछ मानता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है।” वासुदेव श्रीकृष्ण ही सब कुछ हैं, जो यह जान लेता है, वह सबसे बड़ा योगी है। भगवद्गीता में यह बताया गया है कि लोग अनेक जन्मों के बाद इसे जान पाते हैं। इसकी पुष्टि इस श्लोक के दिव्यं वर्षशतम् शब्दों से भी होती है। देवताओं की गणना के अनुसार एक दिन (१२ घंटे) पृथ्वी के छह मास के बराबर होता है। देवताओं के सौ वर्ष पृथ्वी के छत्तीस हजार वर्षों के तुल्य हुए। इस प्रकार राजा मलयध्वज ने छत्तीस हजार वर्षों तक तपस्या की। इसके बाद वे भगवान् की भक्ति में स्थिर हुए। सामान्य मनुष्य को इतने वर्षों तक जीवित रहने के लिए अनेक बार जन्म लेना होगा। इससे श्रीकृष्ण के अभिमत की पुष्टि होती है। कृष्णचेतना प्राप्त करना तथा कृष्ण ही सब कुछ हैं, इस विचार में स्थिर रहना तथा कृष्ण की सेवा करना—ये सिद्धि अवस्था के लक्षण हैं। जैसाकि श्रीचैतन्य-चरितामृत (मध्य २२.६२) में कहा गया है—कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय। जब कोई पूजा द्वारा या कृष्ण की भक्ति करते हुए इस निष्कर्ष तक पहुँचता है कि कृष्ण ही सब कुछ हैं, तो मनुष्य सचमुच ही सब तरह से पूर्ण हो जाता है। उसे न केवल इस निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि कृष्ण ही सब कुछ हैं, वरन् इस विचार पर स्थिर भी रहना पड़ता है। यही जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है और अन्त में मलयध्वज ने यही सिद्धि प्राप्त की।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥