श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 40

 
श्लोक
स व्यापकतयात्मानं व्यतिरिक्ततयात्मनि ।
विद्वान् स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विरराम ह ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
स:—राजा मलयध्वज; व्यापकतया—सर्वव्यापी होने से; आत्मानम्—परमात्मा को; व्यतिरिक्ततया—विभेद से; आत्मनि— अपने आप में; विद्वान्—सुशिक्षित; स्वप्ने—स्वप्न में; इव—सदृश; अमर्श—ज्ञान; साक्षिणम्—साक्षी; विरराम—उदासीन हो गया; ह—निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 आत्मा और परमात्मा में अन्तर कर सकने के कारण राजा मलयध्वज ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। आत्मा एक-स्थानिक है, जबकि परमात्मा सर्वव्यापी है। यह भौतिक देह आत्मा नहीं है, अपितु आत्मा इस भौतिक देह का साक्षी है—उन्हें इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो गया।
 
तात्पर्य
 बद्धजीव प्राय: भौतिक देह, आत्मा तथा परमात्मा का अन्तर समझने के प्रयास में निराश हो जाता है। मायावादी चिन्तक दो प्रकार के हैं—बौद्ध दर्शन के अनुयायी तथा शंकर-दर्शन के अनुयायी। बुद्ध के अनुयायी शरीर के परे कुछ भी नहीं मानते और शंकराचार्य के अनुयायी परमात्मा की पृथक् सत्ता को नहीं मानते। शांकरमत के अनुयायी विश्वास करते हैं कि अन्तत: आत्मा और परमात्मा एकरूप हैं। किन्तु वैष्णव चिन्तक पूर्ण ज्ञानी होने के कारण इस शरीर को बहिरंगा शक्ति से बना मानता है और परमात्मा, को प्रत्येक आत्मा के भीतर स्थित तथा इस प्रकार उससे भिन्न मानता है। जैसाकि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (१३.३) में कहा है—
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥

“हे अर्जुन! तुम जान लो कि मैं समस्त देहों को जाननेवाला हूँ। इस देह तथा इसके स्वामी को जानना ही ज्ञान है। ऐसा मेरा मत है।”

शरीर को क्षेत्र माना जाता है और आत्मा (जीव) को उस क्षेत्र में कार्य करने वाला। किन्तु एक अन्य आत्मा भी है, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो आत्मा के साथ रहकर केवल साक्षी बना रहता है। आत्मा (जीव) कार्य करता है और शरीर के फलों का भोग करता है, किन्तु परमात्मा केवल आत्मा के कार्यों को देखता हैं किन्तु कर्म-फलों का भोग नहीं करता। परमात्मा प्रत्येक कार्यक्षेत्र में वर्तमान है, किन्तु आत्मा तो केवल अपने सीमित शरीर में रहता है। राजा मलयध्वज को ज्ञान की यह पूर्णता प्राप्त थी, वह आत्मा, परमात्मा तथा भौतिक देह में अन्तर करने में सक्षम था।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥