श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 43

 
श्लोक
पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम् ।
प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
पतिम्—अपने पति; परम—परम; धर्म-ज्ञम्—धर्म का ज्ञाता; वैदर्भी—राजा विदर्भ की पुत्री ने; मलय-ध्वजम्—मलयध्वज को; प्रेम्णा—प्रेम से; पर्यचरत्—भक्ति-पूर्वक सेवा की; हित्वा—त्याग कर; भोगान्—इन्द्रियसुख; सा—उसने; पति-देवता—पति को परमेश्वर मानकर ।.
 
अनुवाद
 
 राजा विदर्भ की कन्या अपने पति को परमेश्वर रूप में सर्वेसर्वा मानती थी। उसने सारे इन्द्रिय-सुख त्याग दिये और पूर्णत: विरक्त होकर वह अपने परम ज्ञानी पति के सिद्धान्तों का पालन करने लगी। इस प्रकार वह उसकी सेवा में लगी रही।
 
तात्पर्य
 अलंकारिक भाषा में राजा मलयध्वज गुरु रूप है और उसकी पत्नी वैदर्भी शिष्य है। शिष्य गुरु को परमेश्वर-रूप मानता है। जैसाकि गुर्वाष्टक में श्रील विश्वनाथ चन्द्रवर्ती ठाकुर ने कहा है—साक्षाद्धरित्वेन—“मनुष्य गुरु को साक्षात् भगवान् मानता है।” मनुष्य को मायावादी चिन्तकों की विधि से गुरु स्वीकार न करके यहाँ पर बताई गई विधि से स्वीकार करना चाहिए। चूँकि गुरु भगवान् का परम विश्वस्त दास होता है, इसलिए उसे भगवान् के ही समान मानना चाहिए। गुरु की एक सामान्य मनुष्य की भाँति, उपेक्षा या अवज्ञा नहीं की जानी चाहिए।
यदि कोई स्त्री इतनी भाग्यशाली हो कि वह किसी शुद्ध भक्त की पत्नी हो तो वह इन्द्रियतृप्ति की किसी इच्छा के बिना अपने पति की सेवा कर सकती है। यदि वह अपने उच्चस्थ पति की सेवा में लगी रहती है, तो उसे स्वत: ही अपने पति की आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यदि शिष्य को प्रामाणिक गुरु मिल जाता है, तो केवल उसको प्रसन्न करके वह भगवान् की सेवा का अवसर प्राप्त कर सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥