श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 44

 
श्लोक
चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा ।
बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
चीर-वासा—पुराने वस्त्र पहने; व्रत-क्षामा—तपस्या के कारण अत्यन्त दुर्बल; वेणी-भूत—उलझे हुए, लटें पड़ीं; शिरोरुहा— उसके बाल; बभौ—चमकती थी; उप पतिम्—अपने पति के निकट; शान्ता—अत्यन्त शान्त; शिखा—लपटें; शान्तम्—बुझी हुई; इव—सदृश; अनलम्—अग्नि के ।.
 
अनुवाद
 
 राजा विदर्भ की पुत्री पुराने वस्त्र पहनती थी। वह तपस्या के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गई थी। वह अपने बाल नहीं सँवारती थी जिससे उसमें लटें पड़ गई थीं। यद्यपि वह सदैव अपने पति के निकट रहती थी, किन्तु वह अत्यन्त मौन थी तथा अविचलित अग्नि की लपट के समान अक्षुब्ध (शान्त) थी।
 
तात्पर्य
 जब कोई लकड़ी जलाता है, तो पहले धुआँ तथा विक्षोभ होता है, किन्तु आग लगने पर लकड़ी ठीक से जलने लगती है। इसी प्रकार जब पति तथा पत्नी तप के नियमों का पालन करते हैं, तो वे शान्त रहते हैं और कामोत्तेजित नहीं होते। इस तरह पति-पत्नी दोनों को आध्यात्मिक लाभ मिलता है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए विलासी जीवन का पूर्ण त्याग करना होता है। इस श्लोक में चीरवासा शब्द पुराने फटे वस्त्रों के लिए आया है। पत्नी को विशेष रूप से संयमित होना चाहिए; उसे विलासी वस्त्रों की इच्छा नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी आवश्यकताएँ कम-से-कम कर देनी चाहिए और भोजन तथा नींद भी घटा देनी चाहिए। मैथुन का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यदि पत्नी अपने विशुद्ध भक्त पति की सेवा में लगी रहे तो उसे कभी कामेच्छा नहीं सताती। वानप्रस्थ अवस्था ऐसी ही है। यद्यपि पति तथा पत्नी साथ-साथ रह सकते हैं, किन्तु पत्नी इतना तप करती है कि मैथुन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रकार पति तथा पत्नी निरन्तर साथ-साथ
रहते हैं। चूँकि पत्नी सदैव पति से निर्बल होती है, अत: इस श्लोक में इसको उप पतिम् शब्द से व्यक्त किया गया है। उप का अर्थ है “के निकट” अथवा “लगभग समान।” पुरुष होने से पति अपनी पत्नी की अपेक्षा अधिक आगे बढ़ा होता है, तो भी पत्नी से आशा की जाती है कि वह अपनी विलासप्रिय आदतें छोड़ दे। उसे अच्छे वस्त्र तक नहीं पहनने चाहिए और न ही बाल सँवारने चाहिए। बाल सँवारना स्त्रियों का मुख्य कार्य है। वानप्रस्थ आश्रम में पत्नी को अपने बालों की परवाह नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार उसके बालों में गाठें पड़ जायेंगी। फलत: पत्नी पति के लिए मोहक नहीं रहेगी और स्वयं भी कामेच्छा से विचलित नहीं होगी। इस प्रकार पति-पत्नी दोनों आध्यात्मिक चेतना में अग्रसर हो सकते हैं। यह उन्नत अवस्था परमहंस अवस्था कहलाती है और एक बार प्राप्त हो जाने पर पति-पत्नी देहात्मबुद्धि से छूट जाते हैं। यदि शिष्य गुरु की सेवा में अविचल रहे तो उसे माया के चंगुल में फँसने का डर नहीं रह जाता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥