श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 45

 
श्लोक
अजानती प्रियतमं यदोपरतमङ्गना ।
सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत् ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
अजानती—न जानने से; प्रिय-तमम्—प्राणप्रिय पति को; यदा—जब; उपरतम्—मर गया; अङ्गना—स्त्री; सुस्थिर—अविचल; आसनम्—आसन में; आसाद्य—निकट जाकर; यथा—जिस तरह; पूर्वम्—पहले; उपाचरत्—सेवा करती रही ।.
 
अनुवाद
 
 राजा विदर्भ की पुत्री सुस्थिर मुद्रा में आसन लगाये अपने पति की तब तक पूर्ववत् सेवा करती रही, जब तक उसे यह पता नहीं लग गया कि उसने इस शरीर से कूच कर दिया है।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि रानी सेवा करते समय अपने पति से बोलती तक न थी। वह केवल समुचित कार्य ही करती रहती
थी। इस प्रकार उसने तब तक सेवा करनी बन्द नहीं की जब तक उसके पति के शरीर से प्राण निकल नहीं गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥