श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 5

 
श्लोक
तस्यां प्रपीड्यमानायामभिमानी पुरञ्जन: ।
अवापोरुविधांस्तापान् कुटुम्बी ममताकुल: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तस्याम्—उस नगरी के; प्रपीड्यमानायाम्—विभिन्न कष्टों में पड़ कर; अभिमानी—अत्यधिक लिप्त; पुरञ्जन:—राजा पुरञ्जन ने; अवाप—प्राप्त किया; उरु—अनेक; विधान्—प्रकार के; तापान्—क्लेश; कुटुम्बी—परिवार वाले; ममता-आकुल:—परिवार से लगाव के कारण अत्यधिक व्यग्र ।.
 
अनुवाद
 
 जब इस प्रकार वह नगरी सैनिकों तथा कालकन्या के द्वारा विपदाग्रस्त हो गई तो अपने परिवार की ममता में लिप्त राजा पुरञ्जन यवनराज तथा काल-कन्या के आक्रमण से संकट में पड़ गया।
 
तात्पर्य
 जब हम शरीर का उल्लेख करते हैं, तो उसमें बाहरी स्थूल शरीर के विविध अंग, मन, बुद्धि तथा अहंकार सम्मिलित होते हैं। वृद्धावस्था में ये सब अत्यन्त निर्बल हो जाते हैं जिससे अनेक रोग आ घेरते हैं। शरीर का स्वामी आत्मा ठीक से काम न कर सकने के कारण अत्यन्त दुखी होता है। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जीवात्मा ही इस
शरीर का स्वामी (क्षेत्रज्ञ) है और यह शरीर कर्मभूमि (क्षेत्र) है। जब खेत में तरह-तरह के झाड़झंखाड़ उग आते हैं, तो खेत के स्वामी के लिए कार्य कर पाना कठिन हो जाता है। यही स्थिति आत्मा की हो जाती है, जब शरीर रोग के कारण भार बन जाता है। शरीर के ठीक से काम न करने तथा चिन्ता के कारण शरीर पर अतिरिक्त भार लदता रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥