श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 51

 
श्लोक
तत्र पूर्वतर: कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान् ।
सान्‍त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; पूर्वतर:—पहले का पुराना; कश्चित्—कोई; सखा—मित्र; ब्राह्मण:—ब्राह्मण ने; आत्मवान्—अत्यन्त विद्वान्; सान्त्वयन्—सान्त्वना देते हुए; वल्गुना—अत्यन्त मधुर; साम्ना—शमन करने वाली वाणी से; ताम्—उसको; आह—कहा; रुदतीम्—रोदन करती हुई; प्रभो—हे राजा! ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, एक ब्राह्मण, जो राजा पुरञ्जन का पुराना मित्र था उस स्थान पर आया और रानी को मृदुल वाणी से सान्त्वना देने लगा।
 
तात्पर्य
 पुराने मित्र का ब्राह्मण रूप में प्रकट होना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। परमात्मा रूप में कृष्ण सबके पुराने सखा हैं। वैदिक आदेशों के अनुसार कृष्ण जीव के पास बैठे रहते हैं। इस श्रुति मंत्र—द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया:—भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में सुहृद रूप में स्थित रहता है। भगवान् सदैव इच्छुक रहता है कि जीव उसके धाम वापस आये। साक्षी के रूप में जीव के पास बैठकर भगवान् उसे समस्त भौतिक सुखों को भोगने का अवसर प्रदान करता है, किन्तु जब भी समय मिलता है, तो वह उसे उपदेश भी देता है कि भौतिक साधनों से सुख भोगने की अपेक्षा वह भगवान् की ओर मुख मोड़े और उसका शरणागत बने। जब कोई अपने गुरु के सन्देश का अनुगमन करते के लिए उद्यत रहता है, तो उसका यह संकल्प भगवान् के दर्शन करने के समान होता है। जैसाकि पहले कहा गया है इसका अर्थ हुआ गुरु के आदेश से भगवान् से भेंट। यह वाणी-सेवा कहलाती है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भगवद्गीता के व्यवसायात्मिका बुद्धरेकेह कुरुनन्दन (२.४१) श्लोक की टीका करते हुए कहते हैं कि मनुष्य को चाहिए कि गुरु के वचनों की सेवा करे। शिष्य को चाहिए कि जो गुरु आज्ञा दे उस पर दृढ़ रहे। इसी दिशा में चलकर वह भगवान् का दर्शन करता है।
भगवान् रानी के समक्ष ब्राह्मण रूप में प्रकट हुए, किन्तु वे अपने मूलरूप में श्रीकृष्ण रूप में क्यों नहीं प्रकट हुए? श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि जब तक कोई भगवान् के प्रेम में अत्यधिक आगे बढ़ा हुआ नहीं होता तब तक वह उन्हें उस रूप में नहीं देख सकता। फिर भी यदि वह अपने गुरु द्वारा बनाये गये नियमों में दृढ़ रहता है, तो वह किसी-न-किसी तरह भगवान् की संगति प्राप्त करता है। चूँकि भगवान् हृदय में स्थित हैं, अत: वे निष्ठावान् शिष्य को अन्त:करण से उपदेश दे सकते हैं। इसकी भी पुष्टि भगवद्गीता (१०.१०) में हुई है—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो निरन्तर मेरी भक्ति करते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं, उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।”

निष्कर्ष यह निकला कि यदि कोई शिष्य अपने गुरु के सन्देश को कार्य-रूप देना चाहता है, तो वह तुरन्त वाणी या वपु: से परमेश्वर की संगति प्राप्त करता है। भगवान् के दर्शन का यही रहस्य है। भगवान् को वृन्दावन के किसी कुंज में विहार करते हुए देखने की अपेक्षा, यदि कोई अपने गुरु के वचनों के पालन के नियम पर दृढ़ रहे तो वह बिना किसी कठिनाई के परमेश्वर का दर्शन कर सकता है। इसीलिए श्रील बिल्व मंगल ठाकुर ने कहा है—

भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्याद् दैवेन न: फलति दिव्यकिशोरमूर्ति:।

मुक्ति: स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽस्मान् धर्मार्थकामगतय: समयप्रतीक्षा: ॥

“हे भगवान्! यदि मैं आपकी भक्ति में लगा होऊँ तो मैं आपको सर्वत्र उपस्थित पा सकता हूँ। जहाँ तक मुक्ति का प्रश्न है, मेरे विचार में वह तो मेरे द्वार पर हाथ जोड़े मेरी सेवा करने के लिए प्रतीक्षा करती है और उसके साथ धर्म, अर्थ तथा काम सम्बन्धी सारी भौतिक सुविधाएँ खड़ी रहती हैं।” (कृष्ण-कर्णामृत १०७)। यदि कोई भक्ति में बहुत आगे बढ़ा हुआ है, तो उसे भगवान् के दर्शन करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यदि कोई अपने गुरु की सेवा करता है, तो वह न केवल भगवान् के दर्शन करता है, अपितु मुक्ति भी प्राप्त करता है। जहाँ तक भौतिक सुख-सुविधाएँ हैं, वे स्वत: आती हैं, जिस प्रकार रानी के पीछे-पीछे दासियाँ जाती हैं। शुद्ध भक्त के लिए मुक्ति कोई समस्या नहीं होती। सारी भौतिक सुविधाएँ जीवन के हर स्तर पर उसकी प्रतीक्षा करती रहती हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥