श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 6

 
श्लोक
कन्योपगूढो नष्टश्री: कृपणो विषयात्मक: ।
नष्टप्रज्ञो हृतैश्वर्यो गन्धर्वयवनैर्बलात् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
कन्या—कालकन्या के द्वारा; उपगूढ:—आलिंगित होकर; नष्ट-श्री:—समस्त सौंदर्य से रहित; कृपण:—कंजूस; विषय- आत्मक:—इन्द्रियतृप्ति में लिप्त; नष्ट-प्रज्ञ:—बुद्धि से विहीन; हृत-ऐश्वर्य:—ऐश्वर्य से वंचित; गन्धर्व—गन्धर्वों; यवनै:—तथा यवनों द्वारा; बलात्—बलपूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 कालकन्या द्वारा आलिंगन किए जाने से धीरे-धीरे राजा पुरञ्जन का सारा शारीरिक सौंदर्य जाता रहा। अत्यधिक विषयासक्त होने से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसका सारा ऐश्वर्य नष्ट हो गया। सभी कुछ खो जाने पर गन्धर्वों तथा यवनों ने उसे बलपूर्वक जीत लिया।
 
तात्पर्य
 जब मनुष्य बुढ़ापे का शिकार हो जाता है, किन्तु फिर भी इन्द्रियतृप्ति में लगा रहता है, तो उसका व्यक्तिगत सौंदर्य,
बुद्धि तथा सारी सम्पत्ति क्रमश: नष्ट हो जाती है। इस प्रकार वह कालकन्या के प्रबल आक्रमण को सह नहीं पाता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥