श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 60

 
श्लोक
न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीर: सुहृत्तव ।
न पतिस्त्वं पुरञ्जन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
न—न तो; त्वम्—तुम; विदर्भ-दुहिता—विदर्भ की पुत्री; न—नहीं; अयम्—यह; वीर:—वीर; सु-हृत्—हितैषी पति; तव— तुम्हारा; न—नहीं; पति:—पति; त्वम्—तुम; पुरञ्जन्या:—पुरञ्जनी की; रुद्ध:—बन्दी; नव-मुखे—नव द्वार वाले शरीर में; यया—माया से ।.
 
अनुवाद
 
 वास्तव में न तो तुम विदर्भ की पुत्री हो और न यह पुरुष (मलयध्वज) तुम्हारा हितेच्छु पति है। न ही तुम पुरञ्जनी के वास्तविक पति थे। तुम तो इस नव द्वार वाले शरीर में केवल बन्दी थे।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक जगत में अनेक जीव एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और एक विशेष प्रकार के शरीर से आसक्ति बढ़ जाने पर पिता, पति, माता, पत्नी इत्यादि के रूप में सम्बन्धित हो जाते हैं। वास्तव में प्रत्येक जीव की पृथक् पहचान है और पदार्थ के सम्पर्क के कारण ही वह अन्य शरीरों के साथ में रहता है और झूठे ही उनसे सम्बन्ध स्थापित करता है। झूठे शरीर परिवार, जाति, समाज तथा राष्ट्रीयता के नाम पर विविध संगतियाँ उत्पन्न करते हैं। वास्तव में प्रत्येक जीव भगवान् का अंश है, किन्तु जीव है कि भौतिक देह में अत्यधिक लिप्त रहता है। भगवान् कृष्ण प्रकट होकर भगवद्गीता तथा वैदिक साहित्य के रूप में उपदेश देते हैं। वे यह उपदेश इसलिए देते हैं, क्योंकि वे जीव के शाश्वत मित्र हैं। ये उपदेश महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनसे जीव को दैहिक व्यापारों से मुक्ति मिल सकती है। जब नदी का पानी नीचे की ओर बहता है, तो उसमें किनारे के अनेक तिनके तथा शैवाल मिलते रहते हैं। वे नदी की धारा के साथ बहते रहते हैं, किन्तु जब लहरें इन्हें इधर-उधर उछाल देती हैं, तो वे अलग हो जाते है और अन्यत्र जा लगते हैं। इसी प्रकार इस जगत में असंख्य जीव भौतिक प्रकृति की लहरों द्वारा ले जाये जा रहे हैं। ये लहरें कभी-कभी उन्हें इकट्ठा कर देती हैं और वे एक दूसरे से मित्रता तथा परिवार, जाति या राष्ट्रीयता का दैहिक सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। अन्त में वे प्रकति की लहरों द्वारा एक दूसरे से विलग कर दिए जाते हैं। यह क्रिया प्रकृति की उत्पत्ति के समय से ही चलती आ रही है। इस प्रसंग में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर का गीत है—
मिछे मायार वशे, याच्छ भेसे’ खाच्छ हाबुडुबु, भाइ जीव कृष्ण-दास, ए विश्वास, कार्ले त’ आर, दु:ख नाइ “हे जीवो! तुम भौतिक प्रकृति की लहरों द्वारा ले जाये जा रहे हो। कभी तो तुम ऊपर होते हो, कभी डूबने लगते हो। इस प्रकार तुम्हारा शाश्वत जीवन विनष्ट हो रहा है। यदि तुम श्रीकृष्ण को पकड़ कर एक बार फिर उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण कर सको तो तुम दुखदायक सांसारिक कष्टों से उबर सकते हो।”

इस श्लोक में सुहृत् (हितैषी) तथा तव (तुम्हारा) शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। किसी का तथाकथित पति, परिजन, पुत्र, पिता कोई भी वास्तव में हितैषी नहीं हो सकता है। एकमात्र हितैषी तो स्वयं श्रीकृष्ण हैं। जैसाकि श्रीकृष्ण भगवद्गीता (५.२९) में पुष्टि करते हैं—सुहृदं सर्वभूतानाम्। समाज, मित्रता, प्रेम तथा हितैषी—ये सब विभिन्न देहों में बंधे हुए होने के फलस्वरूप हैं। लोगों को इसे जानना चाहिए और शारीरिक फंदे से, जिसमें वह जन्म-जन्मांतर पड़ा रहता है, निकलने का प्रयत्न करना चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करे और भगवान् के धाम वापस जाये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥