श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 61

 
श्लोक
माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम् ।
मन्यसे नोभयं यद्वै हंसौ पश्यावयोर्गतिम् ॥ ६१ ॥
 
शब्दार्थ
माया—माया; हि—निश्चय ही; एषा—यह; मया—मेरे द्वारा; सृष्टा—रचित; यत्—जिससे; पुमांसम्—नर को; स्त्रियम्—नारी को; सतीम्—साध्वी; मन्यसे—तुम मानते हो; न—नहीं; उभयम्—दोनों; यत्—क्योंकि; वै—निश्चय ही; हंसौ—भौतिक कल्मष से रहित; पश्य—देखो; आवयो:—हमारी; गतिम्—अन्तिम स्थिति ।.
 
अनुवाद
 
 तुम कभी अपने को पुरुष, कभी सती स्त्री और कभी नपुंसक मानते हो। यह सब शरीर के कारण है, जो माया द्वारा उत्पन्न है। यह माया मेरी शक्ति है और वास्तव में हम दोनों—तुम और मैं—विशुद्ध आध्यात्मिक स्वरूप हैं। तुम इसे समझने का प्रयास करो। मैं वास्तविक स्थिति बताने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
 
तात्पर्य
 परमेश्वर तथा जीवात्मा दोनों की वास्तविक स्थिति गुणात्मक रूप से एक-सी है। परमेश्वर परम आत्मा है तथा जीवात्मा व्यष्टि आध्यात्मिक आत्मा है। यद्यपि दोनों ही मूल आध्यात्मिक स्वरूप हैं, किन्तु जीवात्मा जब भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में आता है, तो अपनी पहचान को भूल जाता है और बद्ध हो जाता है। तब वह अपने को प्रकृति का प्रतिफल करके मानता है। भौतिक देह के कारण वह यह भूल जाता है कि वह परमेश्वर का सनातन अंश है। इसकी पुष्टि इस प्रकार होती है— ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। भगवद्गीता में सनातन शब्द कई स्थलों पर आया है। भगवान् तथा जीव दोनों ही सनातन हैं और सनातन नामक एक स्थान भी है, जो इस प्रकृति से परे है। जीव तथा ईश्वर का वास्तविक वासस्थान सनातन राज्य है, यह भौतिक जगत नहीं। यह भौतिक जगत अस्थिर है, भगवान् की बहिरंगा शक्ति है और जीव इस भौतिक जगत में इसलिए आया, क्योंकि वह भगवान् के पद का अनुकरण करना चाहता था।
वह इस भौतिक जगत में यथाशक्ति इन्द्रियभोग करने का प्रयत्न करता है। इस संसार में बद्धजीव के सारे कार्य विभिन्न प्रकार के शरीरों में सम्पन्न होते रहते हैं, किन्तु जब जीव को विकसित चेतना प्राप्त हो तो उसे अपनी स्थिति को सुधारने और पुन: वैकुण्ठ का सदस्य (वासी) बनने का प्रयत्न करना चाहिए। जिस विधि से वह भगवान् के धाम वापस जा सकता है, वह भक्तियोग है, जिसे कभी-कभी सनातन धर्म कहते हैं। भौतिक देह के अनुसार किसी क्षणिक धर्म को न स्वीकार करके मनुष्य को सनातन धर्म या भक्तियोग स्वीकार करना चाहिए जिससे वह भौतिक देहों के इस बन्धन से छुटकारा पा सके और भगवान् के धाम वापस जा सके। जब तक मानव-समाज झूठी भौतिक पहचान (स्वरूप) के आधार पर कार्य करता रहेगा, तब तक सारा विज्ञान तथा दर्शन का तथाकथित विकास व्यर्थ है। उनसे मानव-समाज गुमराह होता है। अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना:। इस संसार में अन्धा अन्धे का मार्गदर्शन कर रहा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥