श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 62

 
श्लोक
अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भो: ।
न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥ ६२ ॥
 
शब्दार्थ
अहम्—मैं; भवान्—तुम; न—नहीं; च—भी; अन्य:—भिन्न; त्वम्—तुम; त्वम्—तुम; एव—निश्चय ही; अहम्—मैं हूँ; विचक्ष्व—देखो; भो:—हे मित्र; न—नहीं; नौ—हमारा; पश्यन्ति—देखते हैं; कवय:—विद्वान पुरुष; छिद्रम्—दोष; जातु— किसी समय; मनाक्—किञ्चित; अपि—भी ।.
 
अनुवाद
 
 हे मित्र, मैं परमात्मा और तुम आत्मा होकर भी हम गुणों में भिन्न नहीं हैं, क्योंकि हम दोनों आध्यात्मिक हैं। वास्तव में, हे मित्र, तुम मुझसे अपनी स्वाभाविक स्थिति में भी गुणात्मक रूप से भिन्न नहीं हो। तुम इस विषय पर तनिक विचार करो। जो वास्तव में महान् विद्वान् हैं और जिन्हें ज्ञान है वे तुममें तथा मुझमें कोई गुणात्मक अन्तर नहीं पाते।
 
तात्पर्य
 भगवान् तथा जीव दोनों ही गुणात्मक रूप से एक हैं। इन दोनों में कोई तथ्यात्मक अन्तर नहीं है। मायावादी चिन्तक बारम्बार माया से इसीलिए पराजित होते रहते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि परमात्मा तथा आत्मा में कोई भेद नहीं है अथवा परमात्मा है ही नहीं। वे सोचने में यह भी भूल करते हैं कि प्रत्येक वस्तु परमात्मा है। किन्तु जो कवय: अर्थात् विद्वान हैं, वे तथ्यों से परिचित होते हैं।
वे ऐसी भूल नहीं करते। वे जानते हैं कि ईश्वर तथा आत्मा गुण में एक ही हैं, किन्तु जीवात्मा माया के चंगुल में पड़ता है, जबकि परमात्मा माया का नियंता है। माया तो परमेश्वर की सृष्टि है (मया सृष्टा ); अत: परमेश्वर माया का अधीक्षक होता है। यद्यपि जीवात्मा गुण में परमेश्वर के ही तुल्य है, किन्तु वह माया के वश में है। मायावादी चिन्तक अधीक्षक तथा अधीन में भेद नहीं कर पाते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥