श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 64

 
श्लोक
एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधित: ।
स्वस्थस्तद्वय‍‌भिचारेण नष्टामाप पुन: स्मृतिम् ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; स:—वह (जीवात्मा); मानस:—मन में एकसाथ रहने वाला; हंस:—हंस के समान; हंसेन—दूसरे हंस के द्वारा; प्रतिबोधित:—उपदेशित होकर; स्व-स्थ:—आत्म-साक्षात्कार में स्थित; तत्-व्यभिचारेण—परमात्मा से बिछुडऩे के कारण; नष्टाम्—नष्ट हुआ; आप—प्राप्त; पुन:—फिर से; स्मृतिम्—वास्तविक स्मरण शक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार दोनों हंस हृदय में एकसाथ रहते हैं। जब एक हंस दूसरे को उपदेश देता है, तो वह अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहता है। इसका अर्थ है कि वह अपनी मूल कृष्णचेतना को प्राप्त कर लेता है, जिसे उसने भौतिक आसक्ति के कारण खो दिया था।
 
तात्पर्य
 यहाँ स्पष्ट कहा गया है—हंसो हंसेन प्रतिबोधित:। जीवात्मा तथा परमात्मा की उपमा दो हंसों से दी गई है, क्योंकि वे निष्कलंक अर्थात् श्वेत होते हैं, किन्तु इनमें से एक हंस श्रेष्ठ है और दूसरे का उपदेशक है। जब निम्न हंस दूसरे से बिछुड़ जाता है, तो वह भौतिक सुख के प्रति आकृष्ट होता है। यही उसके पतन का कारण है। किन्तु जब वह दूसरे हंस से उपदेश ग्रहण करता है, तो उसे अपनी वास्तविक स्थिति का बोध होता है और वह अपनी मूल चेतना को फिर से प्राप्त कर लेता है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण अपने भक्तों को उबारने तथा असुरों को मारने के लिए अवतरित होते हैं। वे भगवद्गीता के रूप में अपना उदात्त (उत्कृष्ट) उपदेश भी देते हैं। जीव को भगवान् तथा गुरु की कृपा से अपनी स्थिति को समझना होता है, क्योंकि मात्र शैक्षिक योग्यता से भगवद्गीता के मूलपाठ को नहीं समझा जा सकता। मनुष्य को सिद्ध पुरुष से भगवद्गीता सीखनी चाहिए।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: ॥

“गुरु के पास जाकर सत्य सीखने का प्रयत्न तो करो। उससे विनम्रतापूर्वक जिज्ञासा करो और उसकी सेवा करो। स्वरूपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकता है, क्योंकि उसने सत्य को देखा है।”(भगवद्गीता ४.३४) इस प्रकार मनुष्य को प्रामाणिक गुरु की खोज करके अपनी मूल चेतना प्राप्त करनी चाहिए। तब जीव की समझ में आयेगा कि वह परमात्मा के सदैव अधीन है। ज्योंही वह अधीनता अस्वीकार करके भोक्ता बनने कि चेष्टा करता है, उसका भौतिक बन्धन प्रारम्भ हो जाता है। जब वह स्वामी अथवा भोक्ता बनने के भाव का परित्याग करता है, तो वह मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है। स्वस्थ: शब्द का अर्थ है—“अपनी मूल स्थिति में होना।” जब वह श्रेष्ठता की अवंाचित मनोवृत्ति को छोड़ देता है, तो वह अपनी मूल स्थिति को प्राप्त करता है। तद्व्यभिचारेण शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह सूचित करता है कि जब जीव अवज्ञावश ईश्वर से विलग हो जाता है, तो उसकी वास्तविक चेतना जाती रहती है। केवल कृष्ण तथा गुरु की कृपा से वह अपनी मुक्त अवस्था को प्राप्त कर सकता है। ये श्लोक श्रील नारद मुनि द्वारा कहे गये हैं और इन्हें कहने का उनका मूल उद्देश्य है हमारी चेतना को जाग्रत करना। यद्यपि जीवात्मा तथा परमात्मा गुणात्मक रूप से एक हैं, किन्तु जीवात्मा को परमात्मा के आदेशों का पालन करना होता है। यही मुक्ति की अवस्था है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥