श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 9

 
श्लोक
कामानभिलषन्दीनो यातयामांश्च कन्यया ।
विगतात्मगतिस्‍नेह: पुत्रदारांश्च लालयन् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
कामान्—सुख के साधन; अभिलषन्—अभिलाषा करते हुए; दीन:—बेचारा; यात-यामान्—बासी; च—भी; कन्यया— कालकन्या के प्रभाव से; विगत—खोया हुआ; आत्म-गति—जीवन का असली लक्ष्य; स्नेह:—आसक्ति; पुत्र—पुत्रों; दारान्— पत्नी; च—तथा; लालयन्—दुलारते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 कालकन्या के प्रभाव से विषयभोग की सारी वस्तुएँ बासी पड़ गई थीं। अपनी कामेच्छाओं के बने रहने के कारण राजा पुरञ्जन अत्यन्त दीन बन चुका था। उसे अपने जीवन-लक्ष्य का भी पता न था। वह अब भी अपनी पत्नी तथा बच्चों के प्रति अत्यन्त आसक्त था और उनके पालन के सम्बन्ध में चिन्तित था।
 
तात्पर्य
 आजकल की सभ्यता की यह सही-सही स्थिति है। प्रत्येक व्यक्ति शरीर, घर तथा परिवार के पालन में लगा हुआ है। फलत: प्रत्येक व्यक्ति जीवन के अन्तिम समय में भ्रमित हो जाता है और उसे इसका ज्ञान नहीं रहता कि आध्यात्मिक जीवन क्या है और जीवन
का लक्ष्य क्या है। इन्द्रियतृप्ति की सभ्यता में भला आध्यात्मिक जीवन कैसे चल सकता है! क्योंकि मनुष्य केवल इस जीवन के विषय में सोचता रहता है। यद्यपि अगला जीवन एक तथ्य है, किन्तु उसे इसके विषय में कोई जानकारी नहीं मिलती।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥