श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  » 

 
 
श्लोक 1:  राजा प्राचीनबर्हि ने उत्तर दिया : हे प्रभु, हम आपके कहे गये राजा पुरञ्जन के रूपक आख्यान (अन्योक्ति) का सारांश पूर्ण रूप से नहीं समझ सके। वास्तव में जो आध्यात्मिक ज्ञान में निपुण हैं, वे तो समझ सकते हैं, किन्तु हम जैसे सकाम कर्मों में अत्यधिक लिप्त पुरुषों के लिए आपके आख्यान का तात्पर्य समझ पाना अत्यन्त कठिन है।
 
श्लोक 2:  नारद मुनि ने कहा : तुम जानो कि पुरञ्जन रूपी जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न रूपों में देहान्तर करता रहता है, जो एक, दो, तीन, चार या अनेक पाँव वाले या पाँवविहीन हो सकते हैं। इन विभिन्न प्रकार के रूपों में देहान्तर करने वाला जीव तथाकथित भोक्ता के रूप में पुरञ्जन कहा जाता है।
 
श्लोक 3:  जिस पुरुष को मैंने अविज्ञात कहा है, वह जीव का स्वामी तथा शाश्वत मित्र परमेश्वर है। चूँकि जीव भगवान् को भौतिक नामों, गुणों या कर्मों द्वारा नहीं जान सकते, फलत: वह बद्धजीव के लिए सदैव अज्ञात रहता है।
 
श्लोक 4:  जब जीव समग्ररूप से प्रकृति के गुणों का भोग करने की इच्छा करता है, तो वह अनेक शारीरिक रूपों में से उस शरीर को चुनता है, जिसमें नौ द्वार, दो हाथ तथा दो पाँव होते हैं। इस प्रकार वह मनुष्य या देवता बनना श्रेयस्कर मानता है।
 
श्लोक 5:  नारद मुनि ने आगे कहा : इस प्रसंग में उल्लिखित प्रमदा शब्द भौतिक बुद्धि या अविद्या के लिए प्रयुक्त है। इसे इसी रूप में समझो। जब मनुष्य ऐसी बुद्धि का आश्रय ग्रहण करता है, तो वह अपने को शरीर समझ बैठता है। “मैं” तथा “मेरी” की भौतिक बुद्धि से प्रभावित होकर वह अपनी इन्द्रियों से दुख तथा सुख का अनुभव करने लगता है। इस प्रकार जीव बन्धन में पड़ जाता है।
 
श्लोक 6:  पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँचों कर्मेन्द्रियाँ पुरञ्जनी के नर मित्र हैं। जीव को इन इन्द्रियों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने तथा कार्य में प्रवृत्त होने में सहायता मिलती है। इन्द्रियों के व्यापार उसकी सखियाँ हैं और वह सर्प जिसे पाँच फनों वाला बताया गया है, पाँच प्रकार की क्रियाओं के भीतर कार्यशील प्राणवायु है।
 
श्लोक 7:  ग्यारहवाँ सेवक, जो अन्यों का नायक है, मन कहलाता है। वह कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों—इन दोनों का नायक है। पञ्चाल राज्य वह वातावरण है, जिसमें पाँच इन्द्रिय-पदार्थों (विषयों) का भोग किया जाता है। इस पञ्चाल राज्य के भीतर शरीर रूपी नगरी है, जिसमें नौ द्वार (छिद्र) हैं।
 
श्लोक 8:  आँखें, नथुने तथा कान—इन द्वारों की जोडिय़ाँ एक स्थान पर स्थित हैं। मुँह, शिश्न तथा गुदा भी अन्य द्वार हैं। इन नौ द्वारों वाले शरीर में स्थित होकर जीव बाह्यत: भौतिक जगत में कार्य करता है और रूप तथा स्वाद जैसे इन्द्रियविषयों का भोग करता है।
 
श्लोक 9:  दो आँखें, दो नथुने तथा मुँह ये पाँचों सामने स्थित हैं। दाहिना कान दक्षिणी द्वार है और बायाँ कान उत्तरी द्वार। पश्चिम की ओर स्थित दो छिद्र या द्वार गुदा तथा शिश्न कहलाते हैं।
 
श्लोक 10:  खद्योत तथा आविर्मुखी नाम से जिन दो द्वारों का वर्णन किया गया है वे एक ही स्थान पर अगल-बगल स्थित दो नेत्र हैं। विभ्राजित नामक नगरी को रूप समझना चाहिए। इस प्रकार दोनों नेत्र सदैव विभिन्न प्रकार के रूपों को देखने में व्यस्त रहते हैं।
 
श्लोक 11:  नलिनी तथा नालिनी नामक दोनों द्वार दो नासाछिद्र (नथुने) हैं और सुगन्ध को सौरभ नामक नगरी ही कहा गया है। अवधूत नामक मित्र घ्राणेन्द्रिय है। मुख्या नामक द्वार मुख है और विपण वाक्शक्ति है। रसज्ञ ही स्वाद की इन्द्रिय (जीभ) है।
 
श्लोक 12:  आपण नामक नगरी जीभ के बोलने के कार्य की सूचक है और बहूदन तरह-तरह के व्यंजनों का सूचक है। दायाँ कान पितृहू द्वार कहलाता है और बायाँ कान देवहू द्वार।
 
श्लोक 13:  नारद मुनि ने आगे कहा : दक्षिण पञ्चाल कही जाने वाली नगरी सकाम कर्म में भोग की विधि अर्थात् प्रवृत्ति-मार्ग को बताने वाले शास्त्रों की सूचक है। उत्तर पञ्चाल नामक अन्य नगरी निवृत्ति मार्ग—सकाम कर्म को घटाने तथा ज्ञान को बढ़ाने वाला मार्ग—बताने वाले शास्त्रों के लिए प्रयुक्त है। जीव को ज्ञान की प्राप्ति दो कानों द्वारा होती है और कुछ लोग पितृलोक तथा कुछ देवलोक को जाते हैं। यह सब दोनों कानों द्वारा सम्भव होता है।
 
श्लोक 14:  ग्रामक नामक पुरी, जहाँ निचले आसुरी द्वार (शिश्न) से पहुँचा जाता है, स्त्री-संभोग के लिए है जो उन सामान्य पुरुषों के लिए अत्यन्त मोहक है जो निरे मूर्ख एवं धूर्त हैं। जननेन्द्रिय दुर्मद कहलाती है और गुदा निर्ऋति कहलाती है।
 
श्लोक 15:  जब यह कहा जाता है कि पुरञ्जन वैशस जाता है, तो उसका अर्थ है कि वह नरक जाता है। उसके साथ लुब्धक रहता है, जो गुदा नामक कर्मेन्द्रिय है। इसके पूर्व मैंने दो अंधे साथियों का भी उल्लेख किया था। इन्हें हाथ तथा पाँव समझना चाहिए। जीव हाथ तथा पाँव की सहायता से सभी प्रकार के कार्य करता और इधर-उधर जाता है।
 
श्लोक 16:  अन्त:पुर हृदय का सूचक है। विषूचिन् (सर्वत्र जाते हुए) मन को बताने वाला है। जीव मन के भीतर प्रकृति के गुणों का भोग करता है। ये सारे प्रभाव कभी मोह उत्पन्न करते हैं, तो कभी सन्तोष तथा उल्लास।
 
श्लोक 17:  पहले यह बताया जा चुका है कि रानी मनुष्य की बुद्धि है। सोते समय या जागते हुए बुद्धि विभिन्न परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। दूषित बुद्धि के कारण जीव कुछ सोचता है और अपनी बुद्धि के कार्य-कारणों का केवल अनुकरण करता है।
 
श्लोक 18-20:  नारद मुनि ने आगे कहा : जिसे मैने रथ कहा था, वह वास्तव में शरीर है। इन्द्रियाँ ही वे घोड़े हैं, जो रथ को खींचते हैं। ज्यों-ज्यों वर्षानुवर्ष समय बीतता जाता है, ये घोड़े बिना किसी अवरोध के दौते हैं, किन्तु वास्तव में वे कोई प्रगति नहीं कर पाते। पाप तथा पुण्य इस रथ के दो पहिए हैं। प्रकृति के तीनों गुण इस रथ की ध्वजाएँ हैं। पाँच प्रकार के प्राण जीव के बन्धन बनते हैं और मन को रस्सी (रज्जु) माना जाता है। बुद्धि इस रथ का सारथी है। हृदय रथ में बैठने का स्थान है और हर्ष तथा पीड़ा जैसे द्वन्द्व जुए हैं। सातों तत्त्व (धातुएँ) इस रथ के ओहार (आवरण) हैं, पाँचों कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकार की बाह्य गतियाँ हैं और ग्यारहों इन्द्रियाँ सैनिक हैं। इन्द्रिय-सुख में मग्न रहने के कारण रथ पर आसीन जीव झूठी अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए इतराता है और जन्म-जन्मांतर तक इन्द्रियसुख के पीछे दौड़ता रहता है।
 
श्लोक 21:  जिसे पहले चण्डवेग अर्थात् शक्तिशाली काल कहा गया था वह दिन तथा रात से बना है जिनके नाम गन्धर्व और गन्धर्वी हैं। शरीर की आयु दिन तथा रात के बीतने से क्रमश: घटती जाती है जिनकी संख्या ३६० है।
 
श्लोक 22:  जिसे कालकन्या कहा गया है, उसे वृद्धावस्था (जरा) समझना चाहिए। कोई भी वृद्धावस्था नहीं स्वीकार करना चाहता, किन्तु यवनराज, जो साक्षात् मृत्यु है, जरा (वृद्धावस्था) को अपनी बहन के रूप में स्वीकार करता है।
 
श्लोक 23-25:  यवनेश्वर (यमराज) के अनुचर मृत्यु के सैनिक कहलाते हैं, जो शरीर तथा मन सम्बन्धी विविध क्लेश माने जाते हैं। प्रज्वार दो प्रकार के ज्वरों का सूचक है—अत्यधिक ताप तथा अत्यधिक शीत—जैसे टाइफाइड तथा निमोनिया। शरीर के भीतर लेटा हुआ जीव विविध क्लेशों द्वारा, जो दैविक, भौतिक तथा अपने ही शरीर तथा मन से सम्बन्धित हैं, विचलित होता रहता है। समस्त प्रकार के क्लेशों के होते हुए भी जीव इस संसार को भोगने की इच्छा से अनेकानेक योजनाओं में बह जाता है। निर्गुण (दिव्य) होकर भी जीव अपने अज्ञान के कारण अहंकारवश (मैं तथा मेरा) इन भौतिक कष्टों को स्वीकार करता है। इस प्रकार वह इस शरीर के भीतर सौ वर्षों तक रहता है।
 
श्लोक 26-27:  जीव की यह प्रकृति है कि उसे अपना अच्छा या बुरा भाग्य चुनने की कुछ-कुछ छूट है, किन्तु जब वह अपने परम स्वामी भगवान् को भुला देता है, तो वह अपने को प्रकृति के गुणों के हवाले कर देता है। इस तरह प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर वह अपने को शरीर मान बैठता है। कभी वह तमोगुण, तो कभी रजोगुण और कभी सतोगुण के अधीन होता है। इस प्रकार जीव प्रकृति के गुणों के अधीन रह कर विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त करता है।
 
श्लोक 28:  जो सतोगुणी हैं, वे वैदिक आदेशों के अनुसार पुण्यकर्म करते हैं और इस तरह वे उच्चलोकों को जाते हैं जहाँ देवों का निवास है। जो रजोगुणी हैं, वे मनुष्य लोक में विभिन्न प्रकार के उत्पादक काम करते हैं। इसी प्रकार तमोगुणी पुरुष विभिन्न प्रकार के कष्ट उठाते हैं और पशु जगत में वास करते हैं।
 
श्लोक 29:  भौतिक प्रकृति के तमोगुण से आच्छादित होकर जीवात्मा कभी नर, कभी नारी, कभी नपुंसक, कभी मनुष्य, कभी देवता, कभी पक्षी, पशु इत्यादि बनता है। इस प्रकार वह इस भौतिक जगत में घूमता रहता है। वह प्रकृति के गुणों के अधीन अपने कर्मों के कारण विभिन्न प्रकार के शरीर स्वीकार करता रहता है।
 
श्लोक 30-31:  यह जीव ठीक उस कुत्ते के तुल्य है, जो भूख से परेशान भोजन पाने के लिए द्वार-द्वार जाता है। अपने प्रारब्ध के अनुसार वह कभी दण्ड पाता है और खदेड़ दिया जाता है, अथवा कभी- कभी खाने को थोड़ा भोजन भी पा जाता है। इसी प्रकार, जीव भी अनेकानेक इच्छाओं के वशीभूत होकर अपने भाग्य के अनुसार विभिन्न योनियों में भटकता रहता है। कभी वह उच्च स्थान प्राप्त करता है, तो कभी निम्न स्थान। कभी वह स्वर्ग को जाता है, कभी नरक को, तो कभी मध्य लोकों को और ऐसा चलता रहता है।
 
श्लोक 32:  सारे जीव भाग्य, अन्य जीवों अथवा मन तथा शरीर सम्बन्धी दुखों से छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं। तो भी इन नियमों का प्रतिकार करने के प्रयासों के बावजूद वे प्रकृति के नियमों द्वारा बद्ध रहते हैं।
 
श्लोक 33:  मनुष्य बोझ को सिर पर लेकर ढो सकता है और जब यह उसे भारी लगने लगे तो कभी- कभी वह बोझ को कन्धे पर रख कर अपने सिर को विश्राम देता है। इस तरह वह बोझ से छुटकारा पाने के लिए प्रयास करता है। फिर भी, वह इस बोझ से मुक्त होने के लिए चाहे जो भी विधि निकाले, वह उस बोझ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखने से अधिक और कुछ नहीं कर सकता।
 
श्लोक 34:  नारद ने आगे कहा : हे शुद्धहृदय पुरुष, कोई भी व्यक्ति कर्मों के फल का निराकरण कृष्णभक्ति से रहित अन्य कर्म करके नहीं कर सकता। ऐसे सारे कर्म हमारे अज्ञान के कारण हैं। जब हम कोई कष्टप्रद स्वप्न देखते हैं, तो हम किसी कष्टप्रद व्यामोह के द्वारा छुटकारा नहीं पा सकते। स्वप्न का निवारण तो जग कर ही किया जा सकता है। इसी प्रकार हमारा भौतिक अस्तित्व हमारे अज्ञान तथा मोह के कारण है। जब तक हममें कृष्णभक्ति नहीं जग जाती, ऐसे स्वप्नों से छुटकारा नहीं मिल सकता। समस्त समस्याओं को हल कर लेने के लिए हमें कृष्णचेतना को जागृत करना होगा।
 
श्लोक 35:  कभी-कभी हमें इसलिए कष्ट होता है, क्योंकि हमें स्वप्न में शेर या सर्प दिख जाता है, किन्तु वास्तव में वहाँ न तो शेर होता है, न सर्प। इस प्रकार हम अपनी सूक्ष्म अवस्था में कोई परिस्थिति उत्पन्न कर लेते हैं और उसके परिणामों को भोगते हैं। इन कष्टों का निवारण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि हम अपने स्वप्न से जग नहीं जाते।
 
श्लोक 36-37:  जीव का वास्तविक हित इसमें है कि वह अविद्या से निकले जिसके कारण उसे बारम्बार जन्म तथा मृत्यु सहनी पड़ती है। इसका एकमात्र निवारण है भगवान् के प्रतिनिधि के माध्यम से उनकी ही शरण ग्रहण करना। जब तक मनुष्य भगवान् वासुदेव की भक्ति नहीं करता, तब तक वह न तो इस भौतिक जगत से पूर्णत: विरक्त हो सकता है और न अपने असली ज्ञान को ही प्रकट कर सकता है।
 
श्लोक 38:  हे राजर्षि, जो श्रद्धावान् है, जो भगवान् की महिमा का निरन्तर श्रवण करता रहता है, जो सदैव कृष्णचेतना के अनुशीलन तथा भगवान् के कार्यकलापों को सुनने में लगा रहता है, वह शीघ्र ही भगवान् का साक्षात्कार करने के योग्य हो जाता है।
 
श्लोक 39-40:  हे राजन्, जिस स्थान में शुद्ध भक्त विधि-विधानों का पालन करते हुए तथा इस प्रकार से नितान्त सचेष्ट रहते हुए एवं उत्सुकतापूर्वक भगवान् के गुणों का श्रवण एवं कीर्तन करते रहते हैं उस स्थान में यदि किसी को अमृत के निरन्तर प्रवाह को सुनने का अवसर प्राप्त हो तो वह जीवन की आवश्यकताएँ—भूख तथा प्यास—भूल जायेगा और समस्त प्रकार के भय, शोक तथा मोह के प्रति निश्चेष्ट हो जायेगा।
 
श्लोक 41:  चूँकि बद्धजीव सदैव भूख तथा प्यास जैसी शारीरिक आवश्यकताओं से विचलित होता रहता है, अत: उसे भगवान् की अमृतवाणी सुनने का अनुराग उत्पन्न करने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।
 
श्लोक 42-44:  समस्त प्रजापतियों के पिता परम शक्तिशाली ब्रह्माजी; शिव; मनु, दक्ष तथा मानवजाति के अन्य शासक; प्रथम कोटि के ब्रह्मचारी सनक, सनातन इत्यादि चारों परम साधु; मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु तथा वसिष्ठ जैसे महर्षि; तथा स्वयं मैं (नारद)—ये सभी महान् ब्राह्मण हैं, जो वैदिक साहित्य पर अधिकारपूर्वक बोल सकते हैं। हम सब तप, ध्यान तथा ज्ञान के कारण अत्यन्त शक्तिशाली हैं। तो भी भगवान् को साक्षात् देखते हुए और अन्वेषण करने पर भी हम उनके विषय में पूर्णत: नहीं जानते।
 
श्लोक 45:  अनन्त वैदिक ज्ञान के अनुशीलन तथा वैदिक मंत्रों के लक्षणों से विभिन्न देवताओं की पूजा के बावजूद देव-पूजा से परम शक्तिशाली भगवान् को समझने में कोई सहायता नहीं मिलती।
 
श्लोक 46:  जब मनुष्य पूर्णत: भक्ति में लगा रहता है, तो अहैतुकी कृपा प्रदर्शित करने वाले भगवान् उस पर कृपा करते हैं। ऐसे अवसर पर जाग्रत भक्त सारे भौतिक कार्यों तथा वेदों में वर्णित अनुष्ठानों को त्याग देता है।
 
श्लोक 47:  हे राजा बर्हिष्मान्, तुम्हें अज्ञानवश कभी भी वैदिक अनुष्ठानों या सकाम कर्मों को अपनाना नहीं चाहिए, भले ही वे कर्णप्रिय क्यों न हों, अथवा आत्म सिद्धि के लक्ष्य प्रतीत होते हों। तुम्हें चाहिए कि इन्हें कभी भी जीवन का चरम लक्ष्य न समझो।
 
श्लोक 48:  अल्पज्ञानी मनुष्य वैदिक अनुष्ठानों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। उन्हें यह ज्ञान नहीं है कि वेदों का प्रयोजन अपने निजी धाम (घर) को जानना है जहाँ भगवान् निवास करते हैं। अपने असली धाम में रुचि न रखकर वे मोहग्रस्त होकर, अन्य धामों की खोज करते रहते हैं।
 
श्लोक 49:  हे राजन्, सारा संसार कुशों के तीखे अग्र भाग से ढका है और इस कारण तुम्हें अभिमान हो गया है क्योंकि तुमने यज्ञों में अनेक प्रकार के पशुओं का वध किया है। अपनी मूर्खतावश तुम्हें यह ज्ञात नहीं है कि भगवान् को प्रसन्न करने का एकमात्र उपाय भक्ति है। तुम इस तथ्य को नहीं समझ सकते। तुम्हें वे ही कार्य करने चाहिए जिनसे भगवान् प्रसन्न हों। हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि हम कृष्णचेतना के स्तर तक ऊपर उठ सकें।
 
श्लोक 50:  भगवान् श्रीहरि इस संसार के समस्त देहधारी जीवों के परमात्मा तथा प्रदर्शक हैं। वे प्रकृति के समस्त भौतिक कार्यों के परम नियामक हैं। वे हमारे श्रेष्ठ सखा भी हैं, अत: प्रत्येक व्यक्ति को उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी चाहिए। ऐसा करने से जीवन कल्याणमय हो जाएगा।
 
श्लोक 51:  जो भक्ति में लगा हुआ है, वह इस संसार से रंचमात्र भी नहीं डरता। इसका कारण यह है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् परम आत्मा हैं और सबके मित्र हैं। जो इस रहस्य को जानता है, वही वास्तव में शिक्षित है और ऐसा शिक्षित व्यक्ति ही संसार का गुरु हो सकता है। जो वस्तुत: प्रामाणिक गुरु अर्थात् कृष्ण का प्रतिनिधि है, वह कृष्ण से अभिन्न होता है।
 
श्लोक 52:  महर्षि नारद ऋषि ने आगे कहा : हे महापुरुष, तुमने जो कुछ मुझसे पूछा है मैंने उसका समुचित उत्तर दे दिया है। अब एक अन्य आख्यान सुनो जो साधु पुरुषों द्वारा स्वीकृत है और अत्यन्त गुह्य है।
 
श्लोक 53:  हे राजा, उस हिरन की खोज करो जो एक सुन्दर उद्यान में अपनी हिरनी के साथ घास चरने में मस्त है। वह हिरन अपने कार्य (चरने) में अत्यधिक अनुरक्त है और उस उद्यान के भौरों के मधुर गुंजार का आनन्द ले रहा है। उसकी स्थिति को समझने का प्रयास करो। उसे इसका पता ही नहीं कि उसके सामने भेडिय़ा है, जो अन्यों के मांस को खाकर अपना पेट पालन करने का आदी है। हिरन के पीछे शिकारी है, जो उसे तीक्ष्ण बाणों से बेधने के लिए तैयार है। इस प्रकार हिरन की मृत्यु निश्चित है।
 
श्लोक 54:  हे राजन्, स्त्री उस पुष्प के समान है, जो प्रारम्भ में अत्यन्त आकर्षक एवं अन्त में अत्यन्त घृणा योग्य हो जाता है। जीव कामेच्छाओं के कारण स्त्री के साथ फँसता है और वह उसी प्रकार संभोग-सुख प्राप्त करता है, जिस प्रकार फूलों की सुगन्ध का भोग किया जाता है। इस प्रकार वह जिह्वा से लेकर शिश्न तक इन्द्रियतृप्ति का जीवन बिताता है और इस प्रकार जीव अपने को गृहस्थ जीवन में अत्यन्त सुखी मानता है। अपनी स्त्री के साथ रहते हुए वह सदैव ऐसे विचारों में मग्न रहता है। वह अपनी पत्नी तथा बच्चों की बातें सुनने में आनन्द का अनुभव करता है। ये उन भौंरों की मधुर गुंजार के तुल्य होती हैं, जो प्रत्येक फूल से मधु एकत्र करते रहते हैं। वह भूल जाता है कि उसके समक्ष काल खड़ा है, जो दिन-रात के बीतने के साथ ही उसकी आयु का हरण करता जा रहा है। उसे न तो धीरे-धीरे हो रही अपनी आयु-क्षय दिखती है और न उसे यमराज की ही परवाह रहती है, जो पीछे से उसे मारने का प्रयत्न करते रहते हैं। तुम इसे समझने का प्रयास करो। तुम अत्यन्त शोचनीय स्थिति में हो और चारों ओर से संकट से घिरे हो।
 
श्लोक 55:  हे राजन्, तुम हिरन की अन्योक्ति की स्थिति को समझने का प्रयास करो। तुम अपने प्रति पूर्ण सचेत रहो और कर्म के द्वारा स्वर्गलोक जाने के श्रवण-सुख को त्याग दो। गृहस्थ जीवन त्याग दो, क्योंकि वह विषयभोगों से तथा ऐसी वस्तुओं की कथाओं से पूर्ण है। तुम मुक्त पुरुषों की कृपा से भगवान् की शरण ग्रहण करो। इस प्रकार से इस संसार के प्रति अपनी आसक्ति का त्याग करो।
 
श्लोक 56:  राजा ने कहा : हे ब्राह्मण, आपने जो कुछ कहा है उसे मैंने अत्यन्त मनोयोग से सुना है और सम्यक् विचार के पश्चात् मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि जिन आचार्यों (शिक्षकों) ने मुझे कर्मकाण्ड में प्रवृत्त किया, वे इस गुह्य ज्ञान को नहीं जानते थे। और यदि वे इससे अवगत थे तो फिर उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया?
 
श्लोक 57:  हे ब्राह्मण, आपके आदेशों तथा मुझे कर्मकाण्ड में प्रवृत्त करने वाले मेरे गुरुओं के उपदेशों में विरोधाभास जान पड़ता है। मैं अब भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य के अन्तर को समझ सकता हूँ। मुझे पहले इनके विषय में कुछ संशय थे, किन्तु आपने कृपा करके इन संशयों को मिटा दिया है। अब मैं समझ सकता हूँ कि बड़े बड़े ऋषि भी जीवन के वास्तविक उद्देश्य के विषय में कैसे मोहग्रस्त होते हैं। निस्सन्देह, इन्द्रियतृप्ति का कोई सवाल ही नहीं उठता।
 
श्लोक 58:  इस जीवन में जीव जो कुछ भी करता है, उसका फल वह अगले जीवन में भोगता है।
 
श्लोक 59:  वेदवादियों का कथन है कि मनुष्य अपने पूर्व कर्मों के फल का भोग करता है। किन्तु व्यावहारिक रूप में यह देखा जाता है कि पिछले जन्म में जिस शरीर ने कर्म किया था वह तो नष्ट हो चुका होता है। अत: उस कर्म का भोग एक भिन्न शरीर द्वारा किस प्रकार सम्भव है?
 
श्लोक 60:  नारद मुनि ने आगे कहा : इस जीवन में जीव स्थूल शरीर में कर्म करता है। यह शरीर मन, बुद्धि तथा अहंकार से निर्मित सूक्ष्म शरीर द्वारा कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है। इस स्थूल शरीर के विनष्ट होने पर भी सूक्ष्म शरीर फल भोगने या कष्ट उठाने के लिए बना रहता है। अत: इससे कोई परिवर्तन नहीं होता।
 
श्लोक 61:  स्वप्न देखते समय जीव अपने वास्तविक शरीर को त्याग देता है और अपने मन तथा बुद्धि के कार्यों से वह दूसरे शरीर में, यथा देवता या कुत्ते के शरीर में, प्रवेश करता है। इस स्थूल शरीर को त्याग कर जीव इस लोक में अथवा अन्य लोक में किसी पशु या देवता के शरीर में प्रवेश करता है। इस प्रकार वह अपने पिछले जीवन के कर्मफलों को भोगता है।
 
श्लोक 62:  जीव इस देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत कार्य करता है कि, “मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, यह मेरा कर्तव्य है, अत: मैं इसे करूँगा।” ये सब मानसिक संस्कार है और ये सारे कर्म अस्थायी हैं; फिर भी भगवान् के अनुग्रह से जीव को अपने समस्त मनोरथ पूरे करने का अवसर प्राप्त होता है। इस लिए उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है।
 
श्लोक 63:  जीव की मानसिक स्थिति को दो प्रकार की इन्द्रियों—कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों—द्वारा समझा जा सकता है। इसी प्रकार किसी मनुष्य की मानसिक स्थिति से उसके पूर्वजन्म की स्थिति को समझा जा सकता है।
 
श्लोक 64:  कभी-कभी हमें ऐसी वस्तु का अचानक अनुभव होता है, जिसे हमने इस शरीर में देख या सुनकर कभी अनुभव नहीं किया। कभी-कभी हमें ऐसी वस्तुएँ अचानक स्वप्न में दिख जाती हैं।
 
श्लोक 65:  अत: हे राजन्, सूक्ष्म मानसिक आवरण वाला यह जीव अपने पूर्व शरीर के कारण सभी प्रकार के विचार तथा प्रतिबिम्ब विकसित करता रहता है। मेरी बात को तुम निश्चय समझो। जब तक पूर्व शरीर में कोई वस्तु देखी हुई नहीं रहती, तब तक मन के द्वारा उसकी कल्पना करने की सम्भावना नहीं उठती।
 
श्लोक 66:  हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो। यह मन प्रकृति के साहचर्य के अनुसार जीव द्वारा विशेष प्रकार का शरीर धारण करने का कारण है। मनुष्य अपने मानसिक संघटन के अनुसार यह जान सकता है कि पूर्वजन्म में वह कैसा था और भविष्य में वह कैसा शरीर धारण करेगा। इस प्रकार मन भूत (गत) तथा भावी शरीरों की सूचना देता है।
 
श्लोक 67:  कभी-कभी स्वप्न में हम ऐसी वस्तु देखते हैं, जिसको हम इस जीवन में कभी न तो अनुभव किये होते और न सुने होते हैं, किन्तु ये सभी घटनाएँ विभिन्न कालों, स्थानों तथा परिस्थितियों में अनुभव की गई होती हैं।
 
श्लोक 68:  जीव का मन विभिन्न स्थूल शरीरों में रहा करता है और इन्द्रियतृप्ति के लिए व्यक्ति की इच्छाओं के अनुसार मन विविध विचारों को अंकित करता रहता है। ये मन में विभिन्न मिश्रणों (मेलों) के रूप में प्रकट होते हैं। अत: कभी-कभी ये प्रतिबिम्ब ऐसी वस्तुओं के रूप में प्रकट होते हैं, जो पहले न तो कभी सुनी गई और न देखी गई होती हैं।
 
श्लोक 69:  कृष्ण-चेतना का अर्थ है ऐसी मानसिक दशा में भगवान् के साथ निरन्तर साहचर्य जिससे कि भक्त इस दृश्य जगत् को वैसा ही देख सके जैसा कि भगवान् देख सकते हैं। ऐसा देख पाना सदैव सम्भव नहीं होता, लेकिन यह राहु नामक अंधग्रह के समान प्रकट होता है, जो पूर्ण चन्द्र होने पर ही देखा जाता है।
 
श्लोक 70:  जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रियों, विषयों तथा भौतिक गुणों के प्रतिफलों से बना हुआ सूक्ष्म भौतिक शरीर रहता है तब तक मिथ्या अहंकार और स्थूल शरीर भी रह जाते हैं।
 
श्लोक 71:  जब जीव गाढ़ निद्रा, मूर्च्छा, किसी गंभीर क्षति से उत्पन्न गहन आघात, मृत्यु के समय या प्रखर ज्वर की अवस्था में रहता है, तो प्राण-वायु का संचरण रुक जाता है। उस समय जीव आत्मा से शरीर की पहचान करने का ज्ञान खो देता है।
 
श्लोक 72:  जब मनुष्य तरुण होता है, तो दसों इन्द्रियाँ तथा मन पूरी तरह दिखाई पड़ते हैं, किन्तु माता के गर्भ या बाल्यकाल में इन्द्रियाँ तथा मन उसी तरह ढके रहते हैं जिस तरह अमावस्या की रात्रि के अंधकार से पूर्ण-चन्द्रमा ढका रहता है।
 
श्लोक 73:  जब जीव स्वप्न देखता है, तो वास्तव में इन्द्रियविषय उपस्थित नहीं रहते। किन्तु इन्द्रियविषयों के साथ मनुष्य का सम्पर्क होने से वे प्रकट हो जाते हैं। इसी प्रकार अविकसित इन्द्रियों वाले जीव का भौतिक रूप से अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता, भले ही वह इन्द्रियविषयों के सम्पर्क में न हो।
 
श्लोक 74:  पाँच इन्द्रिय विषय, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन—ये सोलह भौतिक विस्तार हैं। ये सब जीव के साथ संयोजित रहते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा प्रभावित होते हैं। इस प्रकार बद्धजीव के अस्तित्व को समझा जाता है।
 
श्लोक 75:  सूक्ष्म शरीर की क्रियाओं से जीव स्थूल शरीरों को विकसित करता और त्यागता रहता है। यह आत्मा का देहान्तरण कहलाता है। इस प्रकार आत्मा विभिन्न प्रकार के हर्ष, शोक, भय, सुख तथा दुख का अनुभव करता है।
 
श्लोक 76-77:  इल्ली (कीट विशेष) एक पत्ती को छोडऩे के पहले दूसरी पत्ती को पकड़ कर एक से दूसरी पत्ती में जाती है। इसी प्रकार जीव को अपना शरीर त्यागने के पूर्व अपने पूर्व कर्म के अनुसार अन्य शरीर को ग्रहण करना होता है। इसका कारण यह है कि मन सभी प्रकार की इच्छाओं का आगार (भण्डार) है।
 
श्लोक 78:  जब तक हम इन्द्रियसुखों का भोग करना चाहते हैं तब तक हम भौतिक कार्यों की सृष्टि करते रहते हैं। जब जीव भौतिक क्षेत्र में कर्म करता है, तो वह इन्द्रियों को भोगता है और ऐसा करने से वह भौतिक कर्मों की एक और शृंखला को जन्म देता है। इस प्रकार जीवात्मा बद्ध आत्मा के रूप में जकड़ जाता है।
 
श्लोक 79:  तुम्हें यह सदैव जानना चाहिए कि भगवान् की इच्छा से ही इस दृश्य जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार होता है। फलत: इस दृश्य जगत के अन्तर्गत सारी वस्तुएँ भगवान् के अधीन हैं। इस पूर्ण ज्ञान से प्रकाश प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदैव भगवद्भक्ति में लगे रहना चाहिए।
 
श्लोक 80:  मैत्रेय ऋषि ने कहा : महान् सन्त तथा परम भक्त नारद ने इस प्रकार राजा प्राचीनबर्हि के समक्ष भगवान् तथा जीव की स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या प्रस्तुत की। राजा को आमंत्रित करते हुए नारद मुनि सिद्धलोक को वापस चले गये।
 
श्लोक 81:  अपने मंत्रियों की उपस्थिति में राजर्षि प्राचीनबर्हि ने अपने पुत्रों को नागरिकों की रक्षा करने के लिए आदेश छोड़ा। तब उन्होंने घर छोड़ दिया और तपस्या हेतु कपिलाश्रम नामक तीर्थस्थान के लिए प्रस्थान किया।
 
श्लोक 82:  कपिलाश्रम में तपस्या करके राजा प्राचीनबर्हि ने समस्त भौतिक उपाधियों से पूर्ण मुक्ति प्राप्त कर ली। वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर लगा रहा और गुणात्मक दृष्टि से भगवान् के ही समान आध्यात्मिक पद पर पहुँच गया।
 
श्लोक 83:  हे विदुर, जो कोई जीव के आध्यात्मिक अस्तित्व को समझने से सम्बद्ध, नारद द्वारा कहे गये इस आख्यान को सुनता है या ऐसे अन्यों को सुनाता है, वह देहात्मबुद्धि की अवधारणा से मुक्त हो जाएगा मुक्त हो जाएगा।
 
श्लोक 84:  नारद मुनि द्वारा उद्बोधित यह आख्यान (कथा) भगवान् की दिव्य ख्याति से पूर्ण है। अत: जब इस आख्यान का वर्णन किया जाता है, तो वह इस भौतिक जगत को पवित्र कर देता है। वह जीव के हृदय को पवित्र करता है और उसे आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त करने में सहायक होता है। जो कोई इस दिव्य आख्यान को सुनाता है, वह समस्त भौतिक बन्धनों से मुक्त हो जाएगा और उसे इस भौतिक जगत में भटकना नहीं पड़ेगा।
 
श्लोक 85:  यहाँ पर अधिकार पूर्वक वर्णित राजा पुरञ्जन का रूपक मैंने अपने गुरु से सुना था। यह अध्यात्मिक ज्ञान से पूर्ण है। यदि कोई इस रूपक के उद्देश्य को समझ ले तो वह निश्चय ही देहात्मबुद्धि से छुटकारा पा जाएगा और मृत्यु के पश्चात् जीवन को ठीक से समझ सकेगा। यदि वह आत्मा के देहान्तर को ठीक से न समझ पाये तो वह इस आख्यान को पढक़र उसे अच्छी तरह समझ सकता है।
 
श्लोक 1a-2a:  शरीर, स्त्री तथा बच्चों को पालने की इच्छा पशु समाज में भी देखी जाती है। पशुओं में ऐसे व्यापारों की व्यवस्था करते रहने की पूरी बुद्धि होती है। यदि मनुष्य केवल इसी बात में उन्नत हो तो फिर उसमें तथा पशु में क्या अन्तर है? मनुष्य को यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि विकास प्रक्रम में अनेकानेक जन्मों के पश्चात् यह मानव जीवन प्राप्त होता है। जो बुद्धिमान मनुष्य स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर की देहात्मबुद्धि को त्याग देता है, वह आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से परमेश्वर के ही समान प्रधान आत्मा बन जाएगा।
 
श्लोक 1b:  यदि जीव का विकास कृष्णभक्ति में होता है और वह अन्यों पर दयालु होता है, यदि उसका आत्म-साक्षात्कार का आध्यात्मिक ज्ञान पूर्ण होता है, तो उसे संसार के बन्धन से अविलम्ब मोक्ष प्राप्त हो जाएगा।
 
श्लोक 2b:  काल के अन्तर्गत भूत, वर्तमान तथा भविष्य में जो कुछ घटित होता है, वह मात्र स्वप्न है। समस्त वैदिक साहित्य का यही रहस्य है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥