श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 2b

 
श्लोक
अद‍ृष्टं द‍ृष्टवन्नङ्‌क्षेद्भूतं स्वप्नवदन्यथा ।
भूतं भवद्भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहोरह: ॥ २ब ॥
 
शब्दार्थ
अदृष्टम्—भावी सुख; दृष्ट-वत्—प्रत्यक्ष अनुभव की तरह; नङ्क्षेत्—परास्त हो जाता है; भूतम्—भौतिक संसार; स्वप्नवत्— स्वप्न की तरह; अन्यथा—नहीं तो; भूतम्—गत, भूतकाल में घटित; भवत्—वर्तमान; भविष्यत्—भविष्य; च—भी; सुप्तम्— स्वप्न; सर्व—सबों का; रह:-रह:—रहस्य ।.
 
अनुवाद
 
 काल के अन्तर्गत भूत, वर्तमान तथा भविष्य में जो कुछ घटित होता है, वह मात्र स्वप्न है। समस्त वैदिक साहित्य का यही रहस्य है।
 
तात्पर्य
 वास्तव में सारा संसार मात्र स्वप्न है, अत: भूत, वर्तमान या भविष्य का प्रश्न ही नहीं उठता। जो लोग कर्मकाण्ड विचार वाले हैं जिसका तात्पर्य है कि वे “सकाम कर्मों द्वारा भविष्य के सुख के लिए कार्यरत हैं” वे भी स्वप्न देखते हैं। इसी तरह गत सुख तथा वर्तमान
सुख भी स्वप्न मात्र हैं। वास्तविकता तो कृष्ण तथा कृष्ण-सेवा है, जो हमें माया के चंगुल से बचा सकती है जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता (७.१४) में कहा है—मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते—जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे मेरी माया को पार कर जाते हैं।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कंध के अन्तर्गत “नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप” नामक उन्तीसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥