श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 49

 
श्लोक
आस्तीर्य दर्भै: प्रागग्रै: कार्त्स्‍न्येन क्षितिमण्डलम् ।
स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैषि यत्परम् ।
तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
आस्तीर्य—आच्छादित करके; दर्भै:—कुशा से; प्राक्-अग्रै:—पूर्व की ओर मुख किये; कार्त्स्न्येन—सम्पूर्ण; क्षिति-मण्डलम्— संसार भर में; स्तब्ध:—गर्वीली शुरुआत; बृहत्—अत्यधिक, महान्; वधात्—बध के द्वारा; मानी—अपने को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझने वाला, अभिमानी; कर्म—कर्म; न अवैषि—नहीं जानते हो; यत्—जो; परम्—परम; तत्—उस; कर्म—कर्म; हरि-तोषम्—भगवान् को प्रसन्न करना; यत्—जो; सा—वह; विद्या—शिक्षा; तत्—भगवान् को; मति:—चेतना; यया— जिससे ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, सारा संसार कुशों के तीखे अग्र भाग से ढका है और इस कारण तुम्हें अभिमान हो गया है क्योंकि तुमने यज्ञों में अनेक प्रकार के पशुओं का वध किया है। अपनी मूर्खतावश तुम्हें यह ज्ञात नहीं है कि भगवान् को प्रसन्न करने का एकमात्र उपाय भक्ति है। तुम इस तथ्य को नहीं समझ सकते। तुम्हें वे ही कार्य करने चाहिए जिनसे भगवान् प्रसन्न हों। हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि हम कृष्णचेतना के स्तर तक ऊपर उठ सकें।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में नारद मुनि राजा की प्रत्यक्ष भर्त्सना करते हैं, क्योंकि वह ऐसे यज्ञों के करने में व्यस्त था जिनमें अनेक पशुओं का वध होता था। राजा सोच रहा था कि अनेक यज्ञों को सम्पन्न कर लेने के कारण वह महान् है, किन्तु नारद मुनि उसकी प्रत्यक्ष भर्त्सना करते हैं
कि पशु-वध के कारण ही उसे झूठा गर्व है। वास्तव में कोई भी ऐसा कार्य, जो कृष्णचेतना तक नहीं ले जाता, पापकर्म है और ऐसी शिक्षा, जो कृष्ण को समझने में सहायक नहीं होती, झूठी है। यदि कृष्णचेतना का अभाव हो तो मनुष्य केवल मिथ्या कर्मों तथा झूठी शिक्षा में लगा रहता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥