श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 5

 
श्लोक
बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम् ।
यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
बुद्धिम्—बुद्धि; तु—तब; प्रमदाम्—तरुणी स्त्री (पुरञ्जनी) को; विद्यात्—जानना चाहिए; मम—मेरा; अहम्—मैं; इति—इस प्रकार; यत्-कृतम्—बुद्धि द्वारा सम्पन्न; याम्—जो बुद्धि; अधिष्ठाय—शरण ग्रहण करके; देहे—शरीर में; अस्मिन्—इस; पुमान्—जीव; भुङ्क्ते—भोगता है (कष्ट उठाता तथा सुख पाता है); अक्षभि:—इन्द्रियों से; गुणान्—प्रकृति के तीन गुण ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : इस प्रसंग में उल्लिखित प्रमदा शब्द भौतिक बुद्धि या अविद्या के लिए प्रयुक्त है। इसे इसी रूप में समझो। जब मनुष्य ऐसी बुद्धि का आश्रय ग्रहण करता है, तो वह अपने को शरीर समझ बैठता है। “मैं” तथा “मेरी” की भौतिक बुद्धि से प्रभावित होकर वह अपनी इन्द्रियों से दुख तथा सुख का अनुभव करने लगता है। इस प्रकार जीव बन्धन में पड़ जाता है।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक संसार में तथाकथित बुद्धि वास्तव में अविद्या है। बुद्धि के विमल होने पर इसे बुद्धियोग कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब बुद्धि भगवान् कृष्ण के इच्छाधीन हो जाती है, तो वह बुद्धियोग या भक्तियोग कहलाती है। अत: भगवद्गीता (१०.१०) में श्रीकृष्ण कहते हैं— तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो लोग मेरी सतत भक्ति करते तथा प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं, उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।”

वास्तविक बुद्धि का अर्थ है भगवान् से जुडऩा। जब ऐसा हो जाता है, तो भगवान् अन्त:करण से वास्तविक बुद्धि प्रदान करते रहते हैं जिससे मनुष्य भगवान् के धाम को वापस जा सकता है। इस श्लोक में भौतिक बुद्धि को प्रमदा के रूप में वर्णन किया गया है, क्योंकि इस संसार में जीव झूठे ही वस्तुओं को अपनी कहता है। वह सोचता है कि मैं एक-छत्र राजा हूँ। यह अविद्या है। वास्तव में उसका कुछ नहीं होता। यहाँ तक कि शरीर तथा इन्द्रियाँ भी उसकी नहीं होती, क्योंकि ये उसे भगवान् की प्रेरणा से प्रकृति द्वारा उसकी विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रदत्त हैं। वास्तव में जीव का कुछ भी नहीं है, किन्तु वह प्रत्येक वस्तु के पीछे पगलाया रहता है और कहता है, “यह मेरी है, यह मेरी है, यह मेरी है।” जनस्य मोहोऽयम् अहं ममेति। यही मोह है। जीव का कुछ भी नहीं है, किन्तु वह हर वस्तु को अपनी बताता है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु संस्तुति करते हैं कि इस मिथ्या बुद्धि को मार्जित करना चाहिए (चेतो-दर्पण-मार्जनम् )। जब बुद्धि रूपी दर्पण चमकने लगता है, तो जीव के असली कार्य प्रारम्भ होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जब मनुष्य कृष्णचेतना को प्राप्त होता है, तो उसकी असली बुद्धि कार्य करती है। उस समय उसे ज्ञान होता है कि प्रत्येक वस्तु तो श्रीकृष्ण की है, मेरी नहीं। जब तक मनुष्य हर वस्तु को अपनी मानता है तब तक वह भौतिक चेतना में रहता है और जब वह पूरी तरह समझ जाता है कि हर वस्तु श्रीकृष्ण की है, तो वह कृष्णचेतना को प्राप्त कर लेता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥