श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 52

 
श्लोक
नारद उवाच
प्रश्न एवं हि सञ्छिन्नो भवत: पुरुषर्षभ ।
अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम् ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद ने कहा; प्रश्न:—प्रश्न; एवम्—इस प्रकार; हि—निश्चय ही; सञ्छिन्न:—उत्तरित; भवत:—तुम्हारा; पुरुष- ऋषभ—हे श्रेष्ठ पुरुष; अत्र—यहाँ; मे वदत:—मैं जिस तरह कह रहा हूँ; गुह्यम्—रहस्यपूर्ण, गुप्त; निशामय—सुनो; सु निश्चितम्—भली-भाँति निश्चित किया ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि नारद ऋषि ने आगे कहा : हे महापुरुष, तुमने जो कुछ मुझसे पूछा है मैंने उसका समुचित उत्तर दे दिया है। अब एक अन्य आख्यान सुनो जो साधु पुरुषों द्वारा स्वीकृत है और अत्यन्त गुह्य है।
 
तात्पर्य
 श्रीनारद मुनि स्वयं ही राजा बर्हिष्मान् के गुरु का कार्य कर रहे हैं। नारद की यह आन्तरिक इच्छा थी कि राजा उनके उपदेशों से तुरन्त सभी कर्मकाण्ड बन्द कर दे और भक्ति करने लगे। किन्तु सब कुछ समझते हुए भी राजा अपने कार्यों को बन्द करने के लिए तैयार न था। जैसाकि अगले श्लोकों से स्पष्ट हो जाएगा, राजा अपने पुत्रों को बुलाने वाला था, जो तपस्या करने के लिए घर से दूर गये हुए थे। उनके लौटने पर वह उन्हें राज्य सौंपकर घर छोड़ कर बाहर जाना चाहता था। अनेक लोगों के साथ ऐसा ही होता है। वे प्रामाणिक गुरु बनाकर उसकी बातें सुनते हैं, किन्तु जब गुरु कहता है कि घर छोडक़र भक्ति करो तो वे हिचकिचाते
हैं। गुरु का यह कर्तव्य है कि शिष्य को तब तक उपदेश देता रहे जब तक उसकी समझ में न आ जाये कि यह भौतिकतावादी जीवन-शैली, अर्थात् कर्मकाण्ड तनिक भी लाभप्रद नहीं है। वास्तव में मनुष्य को प्रारम्भ से ही भक्ति करनी चाहिए जैसाकि प्रह्लाद महाराज ने उपदेश दिया है—कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह (भागवत ७.६.१)। वेदों के सभी आदेशों के अनुसार हमें समझ लेना चाहिए जब तक हम कृष्णचेतना तथा भक्ति ग्रहण नहीं करते हम इस संसार में भौतिक कर्मों में अपना समय व्यर्थ गँवाते रहते हैं। इसलिए नारद मुनि ने एक अन्य वृत्तान्त सुनाने का निश्चय किया जिससे राजा गृहस्थी को त्याग सके।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥