श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 60

 
श्लोक
नारद उवाच
येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् ।
भुङ्क्ते ह्यव्यवधानेन लिङ्गेन मनसा स्वयम् ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद ने कहा; येन—जिसके द्वारा; एव—निश्चय ही; आरभते—प्रारम्भ करता है; कर्म—सकाम कर्म; तेन— उसी शरीर से; एव—निश्चय ही; अमुत्र—अगले जीवन में; तत्—वह; पुमान्—जीव; भुङ्क्ते—भोग करता है; हि—क्योंकि; अव्यवधानेन—किसी परिवर्तन के बिना; लिङ्गेन—सूक्ष्म शरीर से; मनसा—मन से; स्वयम्—स्वयं, खुद ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : इस जीवन में जीव स्थूल शरीर में कर्म करता है। यह शरीर मन, बुद्धि तथा अहंकार से निर्मित सूक्ष्म शरीर द्वारा कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है। इस स्थूल शरीर के विनष्ट होने पर भी सूक्ष्म शरीर फल भोगने या कष्ट उठाने के लिए बना रहता है। अत: इससे कोई परिवर्तन नहीं होता।
 
तात्पर्य
 जीव के दो प्रकार के शरीर होते हैं—सूक्ष्म तथा स्थूल। वास्तव में वह सूक्ष्म शरीर के द्वारा भोग करता है, जो मन, बुद्धि तथा अहंकार से बना है। स्थूल शरीर कारणस्वरूप बाह्य आवरण है। जब यह स्थूल शरीर नहीं रहता या मर जाता है, तो स्थूल शरीर का मूल—मन, बुद्धि तथा अहंकार— बना रहता है और दूसरा स्थूल शरीर ग्रहण कर लेता है। यद्यपि स्थूल शरीर ऊपर से बदलते हैं, किन्तु स्थूल शरीर का असली मूल-मन, बुद्धि तथा अहंकार का सूक्ष्म शरीर सदैव बना रहता है। सूक्ष्म शरीर के कार्य, चाहे वे पुण्य हों या पाप, अन्य परिस्थिति उत्पन्न करते हैं जिसमें जीव अगले स्थूल शरीर में सुख या दुख उठाता है। इस प्रकार सूक्ष्म शरीर बना रहता है, जबकि स्थूल शरीर एक के बाद एक- एक करके बदलता रहता है।
चूँकि आधुनिक वैज्ञानिक तथा दार्शनिक अत्यधिक भौतिकतावादी हैं और मायावश उनका ज्ञान हर लिया गया है, अत: वे यह नहीं बता पाते कि स्थूल शरीर किस तरह बदलता है। भौतिकतावादी चिन्तक डार्विन ने स्थूल शरीर में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करने का प्रयत्न किया है, किन्तु सूक्ष्म शरीर या आत्मा का ज्ञान न होने से वह यह स्पष्ट नहीं कर सका कि विकास क्रिया किस प्रकार अग्रसर होती है। मनुष्य का स्थूल शरीर बदलता रहता है, किन्तु वह सूक्ष्म शरीर से कार्य करता रहता है। लोग सूक्ष्म शरीर के कार्यों को नहीं समझ पाते, अत: वे मोहग्रस्त रहते हैं कि एक स्थूल शरीर के कार्य दूसरे स्थूल शरीर को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। सूक्ष्म शरीर के कार्य भी परमात्मा द्वारा नियोजित हैं जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में में बताया गया है—

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

“मैं सबों के हृदय में स्थित हूँ और मुझी से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न होते हैं।” चूँकि परमात्मा रूप में परमेश्वर सदैव प्रत्येक जीवात्मा का मार्गदर्शन करता है, अत: जीवात्मा को पता रहता है कि पूर्वकर्मों के अनुसार किस प्रकार कार्य किया जाये। दूसरे शब्दों में, परमात्मा उसे स्मरण दिलाता है कि इस प्रकार से कैसे कार्य किया जाये। अत: यद्यपि ऊपर से स्थूल शरीर में परिवर्तन जान पड़ता है, किन्तु जीवात्मा के जीवनों के बीच सातत्य रहता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥