श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 62

 
श्लोक
ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन् ।
गृह्णीयात्तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भव: ॥ ६२ ॥
 
शब्दार्थ
मम—मेरा; एते—ये सब; मनसा—मन से; यत् यत्—जो जो; असौ—वह; अहम्—मैं (हूँ); इति—इस प्रकार; ब्रुवन्— स्वीकार करते हुए; गृह्णीयात्—अपने ऊपर ले लेता है; तत्—वह; पुमान्—जीव; राद्धम्—पूर्ण; कर्म—कर्म; येन—जिससे; पुन:—फिर; भव:—संसार ।.
 
अनुवाद
 
 जीव इस देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत कार्य करता है कि, “मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, यह मेरा कर्तव्य है, अत: मैं इसे करूँगा।” ये सब मानसिक संस्कार है और ये सारे कर्म अस्थायी हैं; फिर भी भगवान् के अनुग्रह से जीव को अपने समस्त मनोरथ पूरे करने का अवसर प्राप्त होता है। इस लिए उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है।
 
तात्पर्य
 जब तक मनुष्य देहात्मबुद्धि में लीन रहता है, तब तक उसके सारे कार्य उसी स्तर पर सम्पन्न होते है। इसे समझना कठिन नहीं है। संसार में हम देख रहे है कि प्रत्येक राष्ट्र अन्य राष्ट्र को पिछाड़ देना चाह रहा है और प्रत्येक व्यक्ति अपने संगी व्यक्ति से आगे बढ़ जाना चाहता है। ये सारे कार्य सभ्यता की प्रगति के नाम पर चल रहे है। शरीर को सुखी बनाने की अनेक योजनाएँ है, जो स्थूल शरीर के नष्ट होने पर सूक्ष्म शरीर तक पहुँचती है। यह तथ्य नहीं है कि स्थूल शरीर के नष्ट हो जाने पर जीव भी नष्ट हो जाता है। यद्यपि अनेक महान् दार्शनिकों तथा शिक्षकों की यह मान्यता है कि शरीर के नष्ट होने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है, किन्तु यह सच (तथ्य) नहीं है। इस श्लोक में नारद मुनि का कथन है कि मृत्यु आने पर मनुष्य अपनी योजनाएँ अपने साथ लेता जाता है (गृह्णीयात्) और इन योजनाओं को सम्पन्न करने के लिए उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है। यही पुनर्भव: कहलाता है। जब स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, तो जीव की सारी योजनाएँ मन द्वारा ग्रहण कर ली जाती है और भगवदनुग्रह से जीव को अगले जीवन में इन योजनाओं को साकार करने का अवसर प्राप्त होता है। यह कर्म का विधान कहलाता है। जब तक मन कर्म-विधान में लिप्त रहता है उसे अगले जीवन में एक विशेष प्रकार का शरीर धारण करना पड़ता है।
इस शरीर को सुखी या दुखी बनाने के लिए किये गये कार्यों का समुच्चय कर्म है। हमने सचमुच यह देखा है कि जब एक सज्जन मरने वाले थे तो उन्होंने अपने डाक्टर से कहा कि वह उन्हें चार वर्षों तक और जीवित रहने का अवसर प्रदान करे जिससे वे अपनी योजनाएँ पूरी कर सकें। इसका अर्थ यह हुआ कि वे सज्जन मरते समय अपनी योजनाओं के विषय में सोच रहे थे। अपनी मृत्यु के बाद वह व्यक्ति अपनी योजनाएँ अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा—जो मन, बुद्धि तथा अहंकार से बना है—अपने साथ लेता गया। इस प्रकार परमात्मा के अनुग्रह से, जो हमारे हृदय में सदैव विद्यमान है, उसे दूसरा अवसर प्राप्त होगा।

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—अगले जन्म में उसे परमात्मा से स्मृति प्राप्ति होती है और वह विगत जीवन की योजनाओं को सम्पन्न करने लगता है। भगवद्गीता के एक अन्य श्लोक (१८.६१) में भी इसकी व्याख्या की गई है—

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

“हे अर्जुन! परमेश्वर सबों के हृदय में स्थित है और उन समस्त जीवों को जो मानो माया से निर्मित यंत्र पर आरूढ़ हैं घूमने का निर्देशन कर रहा है।” प्रकृति द्वारा प्रदत्त वाहन पर आसीन तथा अन्त:करण से परमात्मा द्वारा याद दिलाये जाने पर यह जीव अपनी योजनाओं की पूर्ति के लिए ब्रह्माण्ड-भर में यह सोचते हुए संघर्ष करता रहता है “मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं अमरीकी हूँ, मैं भारतीय हूँ” इत्यादि ये सारी उपाधियाँ एक-जैसी है। एक अमरीकी की अपेक्षा एक ब्राह्मण होने या नीग्रो की अपेक्षा एक अमरीकी बनने में कोई लाभ नहीं है। असल में यह सब प्रकृति के गुणों के अन्तर्गत देहात्मबुद्धि है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥