श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 76-77

 
श्लोक
यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च ।
न त्यजेन्म्रियमाणोऽपि प्राग्देहाभिमतिं जन: ॥ ७६ ॥
यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् ।
मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम् ॥ ७७ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; तृण-जलूका—एक प्रकार का कीट; इयम्—यह; न अपयाति—जाती नहीं है; अपयाति—जाती है; च— भी; न—नहीं; त्यजेत्—त्याग देता है; म्रियमाण:—मरणप्राय; अपि—भी; प्राक्—पूर्व; देह—शरीर के साथ; अभिमतिम्— पहचान; जन:—व्यक्ति; यावत्—जब तक; अन्यम्—दूसरा; न—नहीं; विन्देत—प्राप्त करता है; व्यवधानेन—रुकने से; कर्मणाम्—कर्मों का; मन:—मन; एव—निश्चय ही; मनुष्य-इन्द्र—हे पुरुषों के शासक; भूतानाम्—समस्त जीवों का; भव— संसार का; भावनम्—कारण ।.
 
अनुवाद
 
 इल्ली (कीट विशेष) एक पत्ती को छोडऩे के पहले दूसरी पत्ती को पकड़ कर एक से दूसरी पत्ती में जाती है। इसी प्रकार जीव को अपना शरीर त्यागने के पूर्व अपने पूर्व कर्म के अनुसार अन्य शरीर को ग्रहण करना होता है। इसका कारण यह है कि मन सभी प्रकार की इच्छाओं का आगार (भण्डार) है।
 
तात्पर्य
 भौतिक कार्य में अत्यधिक लिप्त जीव भौतिक शरीर के प्रति बहुत अधिक आसक्त रहता है। यहाँ तक कि मृत्यु के समय भी वह अपने शरीर के विषय में तथा अपने सम्बन्धियों के बारे में सोचता रहता है। इस प्रकार वह देहात्मबुद्धि में इतना लीन रहता है कि मृत्यु के क्षण तक भी अपने वर्तमान शरीर को छोडऩा नहीं चाहता। कभी-कभी कोई कोई व्यक्ति मृत्यु के पूर्व अनेक दिनों तक मूर्छावस्था में रहता है। यह विशेष रूप से उन तथाकथित राजनीतिज्ञों तथा नेताओं के साथ घटित होता है, जो यह सोचते हैं कि उनके बिना सारे देश तथा समाज में अराजकता फैल जाएगी। यही माया है। राजनीतिक नेता अपना राजनीतिक पद नहीं छोडऩा चाहते। उनका या तो किसी शत्रु के द्वारा वध कर दिया जाता है या फिर मृत्यु उन्हें मिटा देती है। उत्तम व्यवस्था द्वारा जीव को दूसरा शरीर प्रदान किया जाता है, किन्तु वर्तमान शरीर के प्रति आसक्ति के कारण वह दूसरे शरीर में नहीं जाना चाहता, अत: उसे प्राकृतिक नियमों के द्वारा दूसरा शरीर स्वीकार करने को बाध्य किया जाता है।
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते ॥

“प्रकृति के तीन गुणों के अधीन मोहग्रस्त जीव अपने आपको उन समस्त कार्यों का कर्त्ता मान बैठता है, जो वास्तव में प्रकृति द्वारा सम्पन्न होते हैं” (भगवद्गीता ३.२७)।

प्रकृति अत्यन्त प्रबल है और भौतिक गुण मनुष्य को दूसरा शरीर ग्रहण करने के लिए बाध्य कर देते हैं। यह शक्ति तब दिखती है जब जीव एक उत्तम शरीर से अधम शरीर में जाता है। जो मनुष्य इस शरीर में कुत्ते या सुअर जैसा आचरण करता है उसे अगले जीवन में कुत्ते या सुअर का शरीर धारण करना होगा। भले ही कोई प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति के शरीर का भोग कर रहा हो, किन्तु जब उसे यह पता चल जाता है कि उसे कुत्ते या सुअर का शरीर धारण करना पड़ेगा तो वह वर्तमान शरीर को त्यागना नहीं चाहता। अत: वह मृत्यु के पूर्व अनेक दिनों तक मूर्छा में पड़ा रहता है। अनेक राजनेताओं की मृत्यु के समय ऐसा देखा गया है। निष्कर्ष यह है कि अगला शरीर परम नियन्ता द्वारा पहले से ही निश्चित कर दिया जाता है। जीव तुरन्त ही वर्तमान शरीर को छोड़ कर दूसरे में प्रवेश कर जाता है। कभी-कभी जीव अनुभव करता है कि वर्तमान शरीर की उसकी अनेक इच्छाएँ पूरी नहीं हो पाईं। जो अपने जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्त होते हैं उन्हें प्रेत शरीर में रहना पड़ता है और दूसरा स्थूल शरीर धारण करने को नहीं मिलता। यहाँ तक कि प्रेत शरीर में भी वे अपने पड़ोसियों तथा सम्बन्धियों को तंग करते रहते हैं। ऐसी स्थिति का मुख्य कारण मन है। मन के ही अनुसार विभिन्न प्रकार के शरीर उत्पन्न होते हैं और जीव को उन्हें ग्रहण करना पड़ता है, जिसकी पुष्टि भगवद्गीता (८.६) में हुई है—

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ॥

“शरीर छोड़ते समय मनुष्य जैसी अवस्था का स्मरण करता है उसे वह निश्चित रूप से वही प्राप्त करता है।” अपने शरीर तथा मन में मनुष्य चाहे कुत्ते की तरह या ईश्वर की तरह सोच सकता है और उसे अगला जीवन उसी के अनुसार मिलता है। इसकी व्याख्या भगवद्गीता (१३.२२) में की गई है— पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मषु ॥

“प्रकृति में स्थित जीवात्मा प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों का भोग करते हुए जीवन शैली अपनाता है। गुणों का यही संग जीवात्मा के उत्तम-अधम योनियों में जन्म का कारण है।” जीव भौतिक गुणों के संग के अनुसार ही उत्तम या अधम शरीर में देहान्तर करता है। यदि वह तमोगुण का साथ करता है, तो उसे पशु या अधम व्यक्ति का शरीर प्राप्त होता है, किन्तु यदि वह सतो या रजोगुण का साथ करता है, तो उसे तदनुसार शरीर प्राप्त होता है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१४.१८) में भी हुई है—

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गन्छन्ति तामसा: ॥

“जो लोग सतोगुणी हैं, वे क्रमश: उच्चलोकों को जाते हैं, जो रजोगुणी हैं, वे पृथ्वी लोक पर रह पाते हैं, किन्तु जो तमोगुणी हैं, उनका नरकलोकों को अधोपतन होता हैं।”

संगति का मूल कारण मन है। यह महान् कृष्णभावनामृत-आन्दोलन मानव-समाज के लिए वरदान है, क्योंकि भक्ति के द्वारा यह सबों को कृष्ण के विषय में निरन्तर चिन्तन करने की शिक्षा देता है। इस प्रकार जीवन के अन्त में मनुष्य कृष्ण की संगति को प्राप्त होता है। यह नित्य लीला प्रविष्ट अर्थात् गोलोक वृन्दावन में प्रवेश कहलाता है। भगवद्गीता (१८.५५) का कथन है— भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

“केवल भक्ति के द्वारा भगवान् के सही रूप को समझा जा सकता है। जब कोई ऐसी भक्ति से परमेश्वर का पूर्ण बोध प्राप्त कर लेता है, तो वह भगवान् के धाम में प्रविष्ट हो सकता है।” कृष्णभक्ति में मन के पूर्ण रूप से लीन होने पर मनुष्य गोलोक वृन्दावन नामक लोक में प्रवेश कर सकता है। भगवान् की संगति को प्राप्त करने के लिए कृष्ण को समझना आवश्यक है। कृष्ण को समझने की विधि भक्ति कहलाती है।

कृष्ण के स्वरूप को समझ लेने पर मनुष्य कृष्णलोक में प्रवेश करने और उनकी संगति करने का पात्र बन जाता है। ऐसे प्रतिष्ठित पद का कारण मन है। मन से ही मनुष्य को कुत्तों तथा सुअरों जैसे शरीर प्राप्त हो सकते हैं। अत: मन को कृष्णभक्ति में लीन रखना मानव जीवन की महानतम सिद्धि है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥