श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 81

 
श्लोक
प्राचीनबर्ही राजर्षि: प्रजासर्गाभिरक्षणे ।
आदिश्य पुत्रानगमत्तपसे कपिलाश्रमम् ॥ ८१ ॥
 
शब्दार्थ
प्राचीनबर्हि:—राजा प्राचीनबर्हि; राज-ऋषि:—साधु राजा; प्रजा-सर्ग—नागरिकों का समूह; अभिरक्षणे—रक्षा करने के लिए; आदिश्य—आदेश देकर; पुत्रान्—अपने पुत्रों को; अगमत्—प्रस्थान किया; तपसे—तपस्या करने के लिए; कपिल- आश्रमम्—कपिलाश्रम नामक तीर्थ स्थल को ।.
 
अनुवाद
 
 अपने मंत्रियों की उपस्थिति में राजर्षि प्राचीनबर्हि ने अपने पुत्रों को नागरिकों की रक्षा करने के लिए आदेश छोड़ा। तब उन्होंने घर छोड़ दिया और तपस्या हेतु कपिलाश्रम नामक तीर्थस्थान के लिए प्रस्थान किया।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में प्रजासर्ग शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जब राजर्षि प्राचीनबर्हि को नारद मुनि ने गृहत्याग करने तथा भगवद्भक्ति करने की दीक्षा दी तब तक उसके पुत्र जल में तपस्या करके नहीं लौटे थे। किन्तु उसने उनके वापस आने की प्रतीक्षा नहीं की, अपितु यह संदेश देते गये कि वे प्रजा की रक्षा करें। वीर राघव आचार्य के अनुसार ऐसी रक्षा का अर्थ है प्रजा को चार वर्णों तथा चार आश्रमों के विशिष्ट विभागों में गठित करना। राजाओं का उत्तरदायित्व होता था कि वे यह देखें कि प्रजा चारों वर्णों (अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) तथा चारों आश्रमों (अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास) के धर्मों का पालन कर रही है। इस वर्णाश्रम धर्म को सुगठित किये बिना किसी राज्य में प्रजा पर शासन चलाना अत्यन्त कठिन है। मात्र विधान सभा में प्रत्येक वर्ष अधिनियम बना कर राज्य में प्रजा पर शासन करना तथा उन्हें पूर्ण शान्ति में रखना सम्भव नहीं है। अच्छी सरकार के लिए वर्णाश्रम धर्म अत्यावश्यक है। मनुष्य के एक वर्ग (ब्राह्मणों) को बुद्धिमान तथा ब्राह्मण के रूप में योग्य होना चाहिए, दूसरे वर्ग (क्षत्रिय) को प्रशासन में प्रशिक्षित होना चाहिए, अन्य वर्ग को व्यापार में (वैश्य) और इससे भी अवर वर्ग (शूद्र) को श्रम में प्रशिक्षित होना चाहिए। मनुष्यों के ये चारों वर्ग प्रकृति के अनुसार पहले से हैं, किन्तु सरकार का कर्तव्य होता है कि वह देखे कि ये चारों वर्ग अपने-अपने वर्ण का नियमपूर्वक पालन करें। यह अभिरक्षण कहलाता है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जब नारद के उपदेश से महाराज प्राचीनबर्हि जीवन के उद्देश्य के प्रति आश्वस्त हो गया तो उसने अपने पुत्रों के लौटने की क्षणमात्र भी प्रतीक्षा नहीं की, वरन् तुरन्त ही प्रस्थान कर दिया। उसे अपने पुत्रों के लौटने पर अनेक कार्य करने थे, किन्तु उसने उनके लिए केवल सन्देश छोड़ा। उसने जान लिया था कि यह उसका मुख्य कर्तव्य था। उसने अपने पुत्रों के लिए केवल सन्देश छोड़ा और वह आध्यात्मिक उन्नति के लिए घर छोड़ कर चला गया। यही वैदिक सभ्यता की विधि है।

श्रीधर स्वामी का कथन है कि कपिलाश्रम गंगा नदी तथा बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है, जिसे अब गंगासागर कहा जाता है। आज भी यह स्थान तीर्थयात्रा के लिए प्रसिद्ध है और मकर संक्रान्ति के दिन प्रतिवर्ष लाखों लोग यहाँ एकत्र होकर स्नान करते हैं। इसका नाम कपिलाश्रम इसलिए है क्योंकि यहाँ पर भगवान् कपिल ने रहकर तपस्या की थी। उन्होंने सांख्य दर्शन का प्रवर्तन किया।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥