श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 84

 
श्लोक
एतन्मुकुन्दयशसा भुवनं पुनानं
देवर्षिवर्यमुखनि:सृतमात्मशौचम् ।
य: कीर्त्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठ्यं
नास्मिन् भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्ध: ॥ ८४ ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—यह आख्यान; मुकुन्द-यशसा—भगवान् कृष्ण की ख्याति से; भुवनम्—यह भौतिक जगत; पुनानम्—पवित्र करने वाला; देव-ऋषि—ऋषियों के; वर्य—प्रमुख; मुख—मुख से; नि:सृतम्—निकला हुआ; आत्म-शौचम्—हृदय को पवित्र करने वाला; य:—जो कोई; कीर्त्यमानम्—कीर्तन किया गया; अधिगच्छति—वापस जाता है; पारमेष्ठ्यम्—आध्यात्मिक जगत को; न—कभी नहीं; अस्मिन्—इसमें; भवे—भौतिक जगत में; भ्रमति—घूमता है; मुक्त—मुक्त होकर; समस्त—सभी; बन्ध:— बन्धनों से ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि द्वारा उद्बोधित यह आख्यान (कथा) भगवान् की दिव्य ख्याति से पूर्ण है। अत: जब इस आख्यान का वर्णन किया जाता है, तो वह इस भौतिक जगत को पवित्र कर देता है। वह जीव के हृदय को पवित्र करता है और उसे आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त करने में सहायक होता है। जो कोई इस दिव्य आख्यान को सुनाता है, वह समस्त भौतिक बन्धनों से मुक्त हो जाएगा और उसे इस भौतिक जगत में भटकना नहीं पड़ेगा।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्लोक संख्या ७९ में इंगित किया जा चुका है, नारद मुनि ने अनुष्ठानों एवं कर्मों को सम्पन्न करने में समय न गँवाकर राजा प्राचीनबर्हि को भक्ति करने का उपदेश दिया। इस अध्याय में सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरों के सजीव वर्णन अत्यन्त वैज्ञानिक हैं और नारद मुनि द्वारा व्याख्यायित किये जाने के कारण अत्यन्त प्रामाणिक हैं। ये आख्यान भगवान् की महिमा से पूर्ण होने के कारण मन की शुद्धि के लिए अत्यन्त सशक्त साधन हैं। जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुष्टि की है—चेतो दर्पणमार्जनम्। जितना ही हम कृष्ण के विषय में बोलते, सुनते या उपदेश देते हैं उतना ही हम शुद्ध होते जाते हैं। इसका
अर्थ यह हुआ कि हमें भ्रान्तियुक्त स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर धारण न करके अपनी आध्यात्मिक पहचान ग्रहण करनी होती है। जो इस आध्यात्मिक ज्ञान को समझने का प्रयास करता है, वह इस अज्ञान-सागर से उबर आता है। इस प्रसंग में पारमेष्ठ्यम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। पारमेष्ठ्यम् को ब्रह्मलोक भी कहते हैं, जहाँ ब्रह्मा निवास करता है। ब्रह्मलोक के वासी सदैव ऐसे आख्यानों की चर्चा करते हैं जिससे इस संसार के संहार के बाद वे सीधे वैकुण्ठलोक को जा सकें। जो वैकुण्ठलोक को चला जाता है उसे इस संसार में इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता। कभी-कभी आध्यात्मिक कार्य भी पारमेष्ठ्यम् कहलाते हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥