श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद  »  श्लोक 15

 
श्लोक
ऋषिरुवाच
एवं गिरित्र: प्रिययाभिभाषित:
प्रत्यभ्यधत्त प्रहसन् सुहृत्प्रिय: ।
संस्मारितो मर्मभिद: कुवागिषून्
यानाह को विश्वसृजां समक्षत: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषि: उवाच—मैत्रेय ऋषि ने कहा; एवम्—इस प्रकार; गिरित्र:—भगवान् शिव ने; प्रियया—अपनी प्रिया द्वारा; अभिभाषित:—कहे जाने पर; प्रत्यभ्यधत्त—उत्तर दिया; प्रहसन्—हँसते हुए; सुहृत्-प्रिय:—परिजनों के प्रिय; संस्मारित:— स्मरण करते हुए; मर्म-भिद:—मर्मभेदी, हृदय में चुभने वाले; कुवाक्-इषून्—द्वेषपूर्ण शब्द; यान्—जो (शब्द); आह—कहा; क:—कौन (दक्ष); विश्व-सृजाम्—ब्रह्माण्ड के स्रष्टाओं की; समक्षत:—उपस्थिति में ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय महर्षि ने कहा : इस प्रकार अपनी प्रियतमा द्वारा सम्बोधित किये जाने पर कैलाश पर्वत के उद्धारक शिव ने हँसते हुए उत्तर दिया यद्यपि उसी समय उन्हें विश्व के समस्त प्रजापतियों के समक्ष दक्ष द्वारा कहे गये द्वेषपूर्ण मर्मभेदी शब्द स्मरण हो आये।
 
तात्पर्य
 जब शिवजी ने अपनी पत्नी से दक्ष के विषय में सुना तो मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह हुआ कि उन्हें तुरन्त विश्व के प्रजापतियों की सभा में अपने विरुद्ध कहे गये कटु शब्द याद हो उठे और मन ही मन वे अत्यन्त दुखित हुए, किन्तु अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए ऊपर से हँस पड़े। भगवद्गीता में कहा गया है कि मुक्त पुरुष इस भौतिक संसार में विपत्ति तथा सुख दोनों में मानसिक सन्तुलन बनाये रखता है। अत: यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि शिव जैसा मुक्त पुरुष दक्ष के शब्दों से इतना अप्रसन्न क्यों था? इसका उत्तर श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने दिया है। भगवान् शिव आत्माराम हैं, किन्तु चूँकि उन्हें तमोगुण का भार सौंपा गया है, अत: वे कभी-कभी इस भौतिक जगत के सुख तथा दुख से प्रभावित होते रहते हैं। इस भौतिक जगत तथा आध्यात्मिक जगत के सुख तथा दुख में अन्तर यही है कि आध्यात्मिक जगत में इनका प्रभाव त्रिगुणातीत है। अत: परम जगत में कोई दुखी तो हो सकता है, किन्तु
इस तथाकथित दुख (कष्ट) की अभिव्यक्ति सदैव आनन्दमय होती है। उदाहरणार्थ, बचपन में एक बार भगवान् कृष्ण को माता यशोदा ने डाँटा तो वे रोने लगे। यद्यपि उनके नेत्रों से आँसू गिरे, किन्तु इसे तमोगुण का प्रभाव नहीं मानना चाहिए, क्योंकि यह घटना दिव्य सुख से पूर्ण थी। कृष्ण अनेक प्रकार से लीलाएँ कर रहे थे। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता था कि वे गोपियों को सता रहे हैं, किन्तु ऐसा व्यवहार दिव्य आनन्द से ओत-प्रोत था। भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत में यही अन्तर है। आध्यात्मिक जगत में सब कुछ शुद्ध है, किन्तु भौतिक जगत में वही विकृत दिखता है। चूँकि आध्यात्मिक जगत में सब कुछ पूर्ण (परम) है, अत: सुख तथा दुख में आनन्द के अतिरिक्त अन्य कोई अनुभूति नहीं होती, किन्तु भौतिक जगत में प्रत्येक वस्तु प्रकृति के गुणों से दूषित है, अत: दुख तथा सुख का अनुभव होता रहता है। इसीलिए आत्मज्ञानी पुरुष होते हुए भी तमोगुण का भार सँभालने के कारण शिवजी दुखी हुए।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥