श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद  »  श्लोक 19

 
श्लोक
तथारिभिर्न व्यथते शिलीमुखै:
शेतेऽर्दिताङ्गो हृदयेन दूयता ।
स्वानां यथा वक्रधियां दुरुक्तिभि-
र्दिवानिशं तप्यति मर्मताडित: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—अत:; अरिभि:—शत्रु के द्वारा; न—नहीं; व्यथते—आहत; शिलीमुखै:—वाणों द्वारा; शेते—लेटता है; अर्दित—दुखित; अङ्ग:—अंग, कोई भाग; हृदयेन—हृदय से; दूयता—कष्ट पहुँचाता हुआ; स्वानाम्—स्वजनों का; यथा—जिस प्रकार; वक्र- धियाम्—कुटिल बुद्धि, छली; दुरुक्तिभि:—कटु वचनों से; दिवा-निशम्—अहर्निश, दिन-रात; तप्यति—बेचैन रहता है; मर्म ताडित:—जिसकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है, मर्माहत ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी ने कहा : यदि कोई शत्रु के बाणों से आहत हो तो उसे उतनी व्यथा नहीं होती जितनी कि स्वजनों के कटु वचनों से होती है क्योंकि यह पीड़ा रात-दिन हृदय में चुभती रहती है।
 
तात्पर्य
 हो सकता है कि सती ने सोचा हो कि वह अपने पिता के घर जाने का दुस्साहस करेगी और यदि उसके पिता कटु वचन कहते भी हैं, तो वह सह लेगी, जिस प्रकार कभी-कभी पुत्र अपने माता-पिता की झिड़कियाँ सहता है। लेकिन शिवजी ने उसे स्मरण दिलाया कि वह इतने कटु वचन नहीं सह पाएगी, क्योंकि मनोविज्ञान कहता
है कि भले ही कोई अपने शत्रु के द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा सह ले, क्योंकि वह स्वाभाविक होती है, किन्तु जब कोई व्यक्ति अपने सम्बन्धी के कठोर वचनों से आहत होता है, तो उसे उसकी पीड़ा रात-दिन बनी रहती है और कभी-कभी यह पीड़ा इतनी असह्य हो जाती है कि वह व्यक्ति आत्महत्या ही कर लेता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥