श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
तस्मिन्ब्रह्मर्षय: सर्वे देवर्षिपितृदेवता: ।
आसन् कृतस्वस्त्ययनास्तत्पत्‍न्यश्च सभर्तृका: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—उस (यज्ञ) में; ब्रह्म-ऋषय:—ब्रह्मर्षि गण; सर्वे—समस्त; देवर्षि—देवर्षिगण; पितृ—पूर्वज, पितरगण; देवता:— देवता; आसन्—थे; कृत-स्वस्ति-अयना:—आभूषणों से अच्छी प्रकार से अलंकृत किया गया; तत्-पत्न्य:—उनकी पत्नियाँ; च—तथा; स-भर्तृका:—अपने-अपने पतियों सहित ।.
 
अनुवाद
 
 जब यज्ञ सम्पन्न हो रहा था ब्रह्माण्ड के विभिन्न भागों से अनेक ब्रह्मर्षि, मुनि, पितृकुल के देवता तथा अन्य देवता, आभूषणों से अलंकृत अपनी-अपनी पत्नियों सहित उसमें सम्मिलित हुए।
 
तात्पर्य
 किसी भी शुभ उत्सव में, चाहे ब्याह हो, यज्ञ हो या पूजा हो, विवाहित स्त्रियों के लिए यह शुभ माना जाता है कि वे अच्छे-अच्छे आभूषणों, वस्त्रों तथा अंगरागों से अपने को अलंकृत करें। ये मांगलिक चिह्न हैं। उस ‘बृहस्पति-सव’ नामक महान् यज्ञ में स्वर्ग की अनेक स्त्रियाँ अपने-अपने देवर्षि, राजर्षि तथा देव पतियों के साथ एकत्र हुईं। इस श्लोक में यह विशेष रूप से उल्लेख है कि वे अपने-अपने पतियों के साथ आईं, क्योंकि जब स्त्रियाँ अच्छी तरह अलंकृत होती हैं, तो उनके पति और अधिक मुद्रित होते हैं। देवों तथा मुनियों की पत्नियों की सज्जा, उनके आभूषण तथा वेशभूषा एवं ऋषियों-मुनियों की प्रसन्नता—ये सब उस उत्सव के मांगलिक चिह्न थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥