श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद  »  श्लोक 5-7
 
 
श्लोक
तदुपश्रुत्य नभसि खेचराणां प्रजल्पताम् ।
सती दाक्षायणी देवी पितृयज्ञमहोत्सवम् ॥ ५ ॥
व्रजन्ती: सर्वतो दिग्भ्य उपदेववरस्त्रिय: ।
विमानयाना: सप्रेष्ठा निष्ककण्ठी: सुवासस: ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा स्वनिलयाभ्याशे लोलाक्षीर्मृष्टकुण्डला: ।
पतिं भूतपतिं देवमौत्सुक्यादभ्यभाषत ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—तब; उपश्रुत्य—सुनकर; नभसि—आकाश में; खे-चराणाम्—आकाश मार्ग से जाने वाले (गन्धर्व); प्रजल्पताम्— संलाप; सती—सती; दाक्षायणी—दक्ष की पुत्री; देवी—शिव की पत्नी; पितृ-यज्ञ-महा-उत्सवम्—अपने पिता द्वारा सम्पन्न किया जाने वाला महान् यज्ञ; व्रजन्ती:—जा रहे थे; सर्वत:—सभी; दिग्भ्य:—दिशाओं से; उपदेव-वर-स्त्रिय:—देवताओं की सुन्दर स्त्रियाँ; विमान-याना:—अपने-अपने विमानों में उड़ती हुई; स-प्रेष्ठा:—अपने-अपने पतियों के संग; निष्क-कण्ठी:— लाकेट से युक्त सुन्दर हार पहने; सु-वासस:—सुन्दर वस्त्रों से आभूषित; दृष्ट्वा—देखकर; स्व-निलय-अभ्याशे—अपने घर के निकट; लोल-अक्षी:—चंचल नेत्रोंवाली; मृष्ट-कुण्डला:—सुन्दर कान के आभूषण; पतिम्—अपने पति; भूत-पतिम्—भूतों के स्वामी; देवम्—देवता; औत्सुक्यात्—उत्सुकता से; अभ्यभाषत—वह बोली ।.
 
अनुवाद
 
 दक्ष कन्या साध्वी सती ने आकाश मार्ग से जाते हुए स्वर्ग के निवासियों को परस्पर बातें करते हुए सुना कि उसके पिताद्वारा महान् यज्ञ सम्पन्न कराया जा रहा हैं। जब उसने देखा कि सभी दिशाओं से स्वर्ग के निवासियों की सुन्दर पत्नियाँ, जिनके नेत्र अत्यन्त सुन्दरता से चमक रहे थे, उसके घर के समीप से होकर सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित होकर तथा कानों में कुण्डल एवं गले में लाकेट युक्त हार से अलंकृत होकर जा रही हैं, तो वह अपने पति भूतनाथ के पास अत्यन्त उद्विगता-पूर्वक गई और इस प्रकार बोली।
 
तात्पर्य
 ऐसा लगता है कि शिवजी का निवासस्थान इस लोक में न होकर कहीं बाह्य अन्तरिक्ष में था, अन्यथा विभिन्न दिशाओं से इस लोक की ओर आते हुए विमानों को सती कैसे देख पातीं और विमान के यात्रियों को दक्ष के द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञ के सम्बध में बातें करते हुए कैसे सुन सकती थीं? सती को यहाँ पर दाक्षायणी कहा गया है, क्योंकि वह राजा दक्ष की पुत्री थीं। उपदेव-वर से तात्पर्य है निम्न श्रेणी के देवता, यथा गंधर्व, किन्नर तथा उरग जो वास्तव में देवता न होकर देवताओं तथा मनुष्यों के बीच की श्रेणी के प्राणी हैं। वे भी विमानों से आ रहे थे। स्व-निलयाभ्याशे शब्द सूचित करता है कि वे उनके निवासस्थान के पास से जा रहे थे। यहाँ पर स्वर्ग के निवासियों की पत्नियों की वेशभूषा तथा उनके शारीरिक गठन का सुन्दर वर्णन हुआ है। उनके नेत्र चंचल थे, उनके कुण्डल तथा अन्य आभूषण चमचमा रहे थे, वे एक-से एक सुन्दर वस्त्र धारण किये थीं और उन सबों ने अपने हारों में विशेष लाकेट लगा रखे थे। प्रत्येक स्त्री अपने पति के साथ थी। इस प्रकार वे इतनी सुन्दर लग रही थीं कि सती की भी इच्छा हुई कि वे भी उसी प्रकार सज्जित होकर अपने पति के साथ यज्ञ में जाँए। यह स्त्रियों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
 
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