श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
सत्युवाच
प्रजापतेस्ते श्वशुरस्य साम्प्रतं
निर्यापितो यज्ञमहोत्सव: किल ।
वयं च तत्राभिसराम वाम ते
यद्यर्थितामी विबुधा व्रजन्ति हि ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
सती उवाच—सती ने कहा; प्रजापते:—दक्ष का; ते—तुम्हारे; श्वशुरस्य—ससुर का; साम्प्रतम्—इस समय; निर्यापित:—प्रारम्भ किया गया है; यज्ञ-महा-उत्सव:—महान् यज्ञ; किल—निश्चय ही; वयम्—हम; च—तथा; तत्र—वहाँ; अभिसराम—जा सकें; वाम—हे प्राणप्रिय शिव; ते—तुम्हारा; यदि—यदि; अर्थिता—इच्छा; अमी—ये; विबुधा:—देवता; व्रजन्ति—जा रहे हैं; हि— क्योंकि ।.
 
अनुवाद
 
 सती ने कहा : हे प्राणप्रिय शिव, इस समय आपके श्वसुर महान् यज्ञ कर रहे हैं और सभी देवता आमंत्रित होकर वहीं जा रहे हैं। यदि आप कहें तो हम भी चले चलें।
 
तात्पर्य
 सती को अपने पति तथा पिता के मध्य चल रहे तनाव का पता था, फिर भी सती ने अपने पति से कहा कि चूँकि उसके पिता के घर पर यज्ञ हो रहा है और इतने सारे देवता उसमें जा रहे हैं, अत: वह भी जाना चाहती है। किन्तु वह अपनी इच्छा प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त नहीं कर सकती थी, अत: उसने अपने पति से कहा कि यदि वे जाने के इच्छुक हों तो वह भी उनके साथ चल सकती है। कहने का तात्पर्य यह कि उसने अपनी इच्छा अत्यन्त विनय पूर्वक अपने पति के समक्ष व्यक्त की।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥