श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  » 

 
 
श्लोक 1:  विदुर ने मैत्रेय से जानना चाहा: हे ब्राह्मण, आपने पहले मुझसे प्राचीनबर्हि के पुत्रों के विषय में बतलाया था कि उन्होंने शिव द्वारा रचे हुए गीत के जप से भगवान् को प्रसन्न किया। तो उन्हें इस प्रकार क्या प्राप्त हुआ?
 
श्लोक 2:  हे बार्हस्पत्य, राजा बर्हिषत् के पुत्रों ने, जिन्हें प्रचेता कहते हैं, उन्होंने भगवान् शिवजी से भेंट करने के बाद क्या प्राप्त किया, जो मोक्षदाता भगवान् को अत्यन्त प्रिय हैं? वे वैकुण्ठलोक तो गये ही, किन्तु इसके अतिरिक्त उन्होंने इस जीवन में, अथवा अन्य जीवनों में इस संसार में क्या प्राप्त किया?
 
श्लोक 3:  मैत्रेय ॠषि ने कहा : राजा प्राचीनबर्हि के पुत्र प्रचेताओं ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए समुद्र जल के भीतर कठिन तपस्या की। भगवान् शिव द्वारा प्रदत्त मंत्र का बारम्बार उच्चारण करके वे भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने में समर्थ हुए।
 
श्लोक 4:  प्रचेताओं द्वारा दस हजार वर्षों तक कठिन तपस्या किये जाने के बाद भगवान् तपस्या का फल देने के लिए उनके समक्ष अत्यन्त मनोहर रूप में प्रकट हुए। इससे प्रचेताओं को अपना श्रम सार्थक प्रतीत हुआ।
 
श्लोक 5:  गरुड़ के कन्धे पर आसीन भगवान् मेरु पर्वत की चोटी पर छाये बादल के समान प्रतीत हो रहे थे। भगवान् का दिव्य शरीर आकर्षक पीताम्बर से ढका था और उनकी गर्दन कौस्तुभ मणि से सुशोभित थी। भगवान् के शारीरिक तेज से ब्रह्माण्ड का सारा अंधकार दूर हो रहा था।
 
श्लोक 6:  भगवान् का मुख अत्यन्त सुन्दर था और उनका सिर चमकीले मुकुट तथा सुनहरे आभूषणों से सुशोभित था। यह मुकुट झिलमिला रहा था और सिर पर अत्यन्त सुन्दर ढंग से लगा था। भगवान् के आठ भुजाएँ थीं और प्रत्येक भुजा में एक विशेष आयुध था। वे देवताओं, ऋषियों तथा अन्य पार्षदों से घिरे हुए थे। ये सब उनकी सेवा कर रहे थे। भगवान् का वाहन गरुड़ अपने पंखों को फडफ़ड़ा कर वैदिक स्तोत्रों से भगवान् की महिमा का इस प्रकार गान कर रहा था मानो वह किन्नर लोक का वासी हो।
 
श्लोक 7:  भगवान् के गले के चारों ओर घुटनों तक पहुँचने वाली फूलों की माला लटक रही थी। उनकी आठ बलिष्ट तथा लम्बी भुजाएँ उस माला से विभूषित थीं, जो लक्ष्मी जी की सुन्दरता को चुनौती दे रही थीं। दयापूर्ण चितवन तथा मेघ-गर्जना के समान वाणी से भगवान् ने राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रों को सम्बोधित किया जो उनकी शरण में आ चुके थे।
 
श्लोक 8:  भगवान् ने कहा : हे राजपुत्रो, मैं तुम लोगों के परस्पर मित्रतापूर्ण सम्बन्धों से अत्यधिक प्रसन्न हूँ। तुम सभी एक ही कार्य—भक्ति—में लगे हो। मैं तुम लोगों की मित्रता से इतना अधिक प्रसन्न हूँ कि मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूँ। अब तुम जो वर चाहो माँग सकते हो।
 
श्लोक 9:  भगवान् ने आगे कहा : जो प्रतिदिन संध्या समय तुम्हारा स्मरण करेंगे वे अपने भाइयों के प्रति तथा अन्य समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखेंगे।
 
श्लोक 10:  जो लोग शिवजी द्वारा प्रणीत स्तुति से प्रात: तथा सायंकाल मेरी प्रार्थना करेंगे, उन्हें मैं वर प्रदान करूँगा। इस तरह वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के साथ-साथ सद्बुद्धि भी प्राप्त कर सकेंगे।
 
श्लोक 11:  चूँकि तुम लोगों ने अपने अन्त:करण से प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता की आज्ञा अत्यन्त श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य की है और उसका पालन किया है, अत: तुम्हारे आकर्षक गुण संसार-भर में सराहे जाएँगे।
 
श्लोक 12:  तुम सब को एक उत्तम पुत्र प्राप्त होगा जो भगवान् ब्रह्माजी से किसी भी प्रकार न्यून नहीं होगा। फलस्वरूप वह सारे ब्रह्माण्ड में अत्यन्त प्रसिद्ध होगा और उससे उत्पन्न पुत्र तथा पौत्र तीनों लोकों को भर देंगे।
 
श्लोक 13:  हे राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रो, प्रम्लोचा नामक अप्सरा ने कण्डु की कमलनयनी कन्या को जंगली वृक्षों की रखवाली में छोड़ दिया और फिर वह स्वर्गलोक को चली गई। यह कन्या कण्डु ऋषि तथा प्रम्लोचा नामक अप्सरा के संयोग से उत्पन्न हुई थी।
 
श्लोक 14:  तत्पश्चात् वृक्षों के संरक्षण में रखा गया वह शिशु भूख से रोने लगा। उस समय वन के राजा अर्थात् चन्द्रलोक के राजा ने दयावश अपनी अंगुली (तर्जनी) शिशु के मुख में रखी जिससे अमृत निकलता था। इस प्रकार उस शिशु का पालनपोषण चन्द्र राजा की कृपा से हुआ।
 
श्लोक 15:  चूँकि तुम सभी मेरी आज्ञा का पालन करने वाले हो, अत: मैं तुम्हें उस कन्या के साथ तुरन्त विवाह करने के लिए कहता हूँ क्योंकि वह अत्यन्त योग्य है, सुन्दरी है और उत्तम गुणों वाली है। अपने पिता की आज्ञा के अनुसार तुम उससे संतति उत्पन्न करो।
 
श्लोक 16:  तुम सभी भाई भक्त तथा अपने पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने के कारण समान स्वभाव वाले हो। यह लडक़ी भी उसी तरह की है और तुम सबके प्रति समर्पित है। अत: यह लडक़ी तथा तुम प्राचीनबर्हिषत् के सारे पुत्र एक ही नियम से बँधे होकर समान पद पर स्थित हो।
 
श्लोक 17:  तब भगवान् ने सभी प्रचेताओं को आशीर्वाद दिया: हे राजकुमारो, मेरे अनुग्रह से तुम इस संसार की तथा स्वर्ग की सभी सुविधाओं को भोग सकते हो। तुम उन्हें बिना किसी बाधा के पूर्ण समर्थ रहते हुए दस लाख दिव्य वर्षों तक भोग सकते हो।
 
श्लोक 18:  तत्पश्चात् तुम मेरे प्रति शुद्ध भक्ति विकसित करोगे और समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाओगे। उस समय तथाकथित स्वर्गलोक तथा नरकलोक में भौतिक भोगों से विरक्त होकर तुम मेरे धाम को लौटोगे।
 
श्लोक 19:  जो लोग भक्ति के शुभ कार्यों में लगे होते हैं, वे यह भलीभाँति समझते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही समस्त कर्मों के परम भोक्ता हैं। अत: जब भी ऐसा व्यक्ति कोई कार्य करता है, तो कर्मफल भगवान् को अर्पित कर देता है और भगवान् की कथाओं में व्यस्त रहते हुए ही सारा जीवन बिताता है। ऐसा व्यक्ति गृहस्थाश्रम में रह कर भी कर्मफलों से प्रभावित नहीं होता।
 
श्लोक 20:  सदैव भक्ति कार्यों में संलग्न रह कर भक्तजन अपने आपको ताजा तथा अपने कार्यों में सदैव नवीन (नया नया) अनुभव करते हैं। भक्त के हृदय के भीतर सर्वज्ञाता परमात्मा प्रत्येक वस्तु को अधिकाधिक नया बनाता रहता है। परम सत्य के पक्षधर (ब्रह्मवादी) इसे ब्रह्मभूत कहते हैं। ऐसी ब्रह्मभूत अर्थात् मुक्त अवस्था में मनुष्य कभी मोहग्रस्त नहीं होता। न ही वह पश्चात्ताप करता है, न वृथा ही हर्षित होता है। यह ब्रह्मभूत अवस्था के कारण होता है।
 
श्लोक 21:  मैत्रेय ऋषि ने कहा : भगवान् के इस प्रकार कहने पर प्रचेताओं ने उनकी प्रार्थना की। भगवान् जीवन की समस्त सिद्धियों को देने वाले और परम कल्याणकर्ता हैं। वे परम मित्र भी हैं, क्योंकि वे भक्तों के समस्त कष्टों को हरते हैं। प्रचेताओं ने आनन्दातिरेक से गद्गद वाणी में प्रार्थना करनी प्रारम्भ की। वे भगवान् का साक्षात् दर्शन करने से शुद्ध हो गये।
 
श्लोक 22:  प्रचेताओं ने कहा : हे भगवन्, आप समस्त प्रकार के क्लेशों को हरने वाले हैं। आपके उदार दिव्य गुण तथा पवित्र नाम कल्याणप्रद हैं। इसका निर्णय पहले ही हो चुका है। आप मन तथा वाणी से भी अधिक वेग से जा सकते हैं। आप भौतिक इन्द्रियों द्वारा नहीं देखे जा सकत। अत: हम आपको बारम्बार सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 23:  हे भगवन्, हम आपको प्रणाम करने की याचना करते हैं। जब मन आप में स्थिर होते हैं, तो यह द्वैतपूर्ण संसार भौतिक सुख का स्थान होते हुए भी व्यर्थ प्रतीत होता है। आपका दिव्य रूप दिव्य आनन्द से पूर्ण है। अत: हम आपका अभिवादन करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के रूप में आपका प्राकट्य इस दृश्य जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के उद्देश्य से होता है।
 
श्लोक 24:  हे भगवन्, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि आपका अस्तित्व समस्त भौतिक प्रभावों से पूर्णतया स्वतंत्र है। आप सदैव अपने भक्तों के क्लेशों को हर लेते हैं, क्योंकि आपका मस्तिष्क जानता है कि ऐसा किस प्रकार करना चाहिए। आप परमात्मा रूप में सर्वत्र रहते हैं, अत: आप वासुदेव कहलाते हैं। आप वसुदेव को अपना पिता मानते हैं और आप कृष्ण नाम से विख्यात हैं। आप इतने दयालु हैं कि अपने समस्त प्रकार के भक्तों के प्रभाव को बढ़ाते हैं।
 
श्लोक 25:  हे भगवन्, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि आपकी ही नाभि से कमल पुष्प निकलता है, जो समस्त जीवों का उद्गम है। आप सदैव कमल की माला से सुशोभित रहते हैं और आपके चरण सुगंधित कमल पुष्प के समान हैं। आपके नेत्र भी कमल पुष्प की पंखडिय़ों के सदृश हैं, अत: हम आपको सदा ही सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 26:  हे भगवन्, आपके द्वारा धारण किया गया वस्त्र कमल पुष्प के केसर के समान पीले रंग का है, किन्तु यह किसी भौतिक पदार्थ का बना हुआ नहीं है। प्रत्येक हृदय में निवास करने के कारण आप समस्त जीवों के समस्त कार्यों के प्रत्यक्ष साक्षी हैं। हम आपको पुन:पुन: सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 27:  हे भगवन्, हम बद्धजीव देहात्मबुद्धि के कारण सदैव अज्ञान से घिरे रहते हैं, अत: हमें भौतिक जगत के क्लेश ही सदैव प्रिय लगते हैं। इन क्लेशों से हमारा उद्धार करने के लिए ही आपने इस दिव्य रूप में अवतार लिया है। यह हम-जैसे कष्ट भोगने वालों पर आपकी अनन्त अहैतुकी कृपा का प्रमाण है। तो फिर उन भक्तों के विषय में क्या कहें जिनके प्रति आप सदैव कृपालु रहते हैं?
 
श्लोक 28:  हे भगवन्, आप समस्त अमंगल के विनाशकर्ता हैं। आप अपने अर्चा-विग्रह विस्तार के द्वारा अपने दीन भक्तों पर दया करने वाले हैं। आप हम सबों को अपना शाश्वत दास समझें।
 
श्लोक 29:  जब भगवान् अपनी सहज दया से अपने भक्त के विषय में सोचते हैं, तो उस विधि से ही नवदीक्षित भक्तों की सारी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। जीव के अत्यन्त तुच्छ होने पर भी भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं। भगवान् जीव के सम्बन्ध में प्रत्येक बात, यहाँ तक कि उसकी समस्त इच्छाओं, को भी जानते रहते हैं। यद्यपि हम अत्यन्त तुच्छ जीव हैं फिर भी भगवान् हमारी इच्छाओं को क्यों नहीं जानेंगे?
 
श्लोक 30:  हे जगत् के स्वामी, आप भक्तियोग के वास्तविक शिक्षक हैं। हमें सन्तोष है कि हमारे जीवन के परमलक्ष्य आप हैं और हम प्रार्थना करते हैं कि आप हम पर प्रसन्न हों। यही हमारा अभीष्ट वर है। हम आपकी पूर्ण प्रसन्नता के अतिरिक्त और कुछ भी कामना नहीं करते।
 
श्लोक 31:  अत: हे स्वामी, हम आपसे वर देने के लिए प्रार्थना करेंगे, क्योंकि आप समस्त दिव्य प्रकृति से परे हैं और आपके ऐश्वर्यों का कोई अन्त नहीं है। अत: आप अनन्त नाम से विख्यात हैं।
 
श्लोक 32:  हे स्वामी, जब भौंरा दिव्य पारिजात वृक्ष के निकट पहुँच जाता है, तो वह उसे कभी नहीं छोड़ता क्योंकि उसे ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। इसी प्रकार जब हमने आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण की है, तो हमें और क्या वर माँगने की आवश्यकता है?
 
श्लोक 33:  हे स्वामी, हमारी प्रार्थना है कि जब तक हम अपने सांसारिक कल्मष के कारण इस संसार में रहें और एक शरीर से दूसरे में तथा एक लोक से दूसरे लोक में घूमते रहें, तब तक हम उनकी संगति में रहें जो आपकी लीलाओं की चर्चा करने में लगे रहते हैं। हम जन्म-जन्मांतर विभिन्न शारीरिक रूपों में और विभिन्न लोको में इसी वर के लिए प्रार्थना करते हैं।
 
श्लोक 34:  एक क्षण की भी शुद्ध भक्त की संगति के सामने स्वर्गलोक जाने अथवा पूर्ण मोक्ष पा कर ब्रह्मतेज में मिलने (कैवल्य) की कोई तुलना नहीं की जा सकती है। शरीर को त्याग कर मरने वाले जीवों के लिए सर्वश्रेष्ठ वर तो शुद्ध भक्तों की संगति है।
 
श्लोक 35:  जब भी दिव्य लोक की कथाओं की चर्चा चलती है, श्रोतागण, भले ही क्षण-भर के लिए क्यों न हो, समस्त भौतिक तृष्णाएँ भूल जाते हैं। यही नहीं, आगे से वे एक दूसरे से न तो वैर करते हैं, न किसी कुण्ठा या भय से ग्रस्त होते हैं।
 
श्लोक 36:  जहाँ भक्तों के बीच भगवान् के पवित्र नाम का श्रवण तथा कीर्तन चलता रहता है, वहाँ भगवान् नारायण उपस्थित रहते हैं। संन्यासियों के चरम लक्ष्य भगवान् नारायण ही हैं और नारायण की पूजा उन व्यक्तियों द्वारा इस संकीर्तन आन्दोलन के माध्यम से की जाती है, जो भौतिक कल्मष से मुक्त हो चुके हैं। वे बारम्बार भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं।
 
श्लोक 37:  हे भगवन्, आपके पार्षद तथा भक्त संसार-भर में तीर्थस्थानों तक को पवित्र करने के लिए भ्रमण करते रहते हैं। जो इस संसार से भयभीत हैं, क्या ऐसा कार्य इन सबके लिए रुचिकर नहीं होता?
 
श्लोक 38:  हे भगवन्, हम भाग्यशाली हैं कि आपके अत्यन्त प्रिय तथा अभिन्न मित्र शिवजी की क्षणमात्र की संगति से हम आपको प्राप्त कर सके हैं। आप इस संसार के असाध्य रोग का उपचार करने में समर्थ सर्वश्रेष्ठ वैद्य हैं। हमारा सौभाग्य था कि हमें आपके चरणकमलों का आश्रय प्राप्त हो सका।
 
श्लोक 39-40:  हे भगवन्, हमने वेदों का अध्ययन किया है, गुरु बनाया है और ब्राह्मणों, भक्तों तथा आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यधिक उन्नत वरिष्ट पुरुषों को सम्मान प्रदान किया है। हमने अपने किसी भी भाई, मित्र या अन्य किसी से ईर्ष्या नहीं की। हमने जल के भीतर रहकर कठिन तपस्या भी की है और दीर्घकाल तक भोजन नहीं ग्रहण किया। हमारी ये सारी आध्यात्मिक सम्पदाएँ आपको प्रसन्न करने के लिए सादर समर्पित हैं। हम आपसे केवल यही वर माँगते हैं, अन्य कुछ भी नहीं।
 
श्लोक 41:  हे भगवन्, तप तथा ज्ञान के कारण सिद्धिप्राप्त बड़े-बड़े योगी तथा शुद्ध सत्व में स्थित लोगों के साथ-साथ मनु, ब्रह्मा तथा शिव जैसे महापुरुष भी आपकी महिमा तथा शक्तियों को पूरी तरह नहीं समझ पाते। फिर भी वे यथाशक्ति आपकी प्रार्थना करते हैं। उसी प्रकार हम इन महापुरुषों से काफी क्षुद्र होते हुए भी अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रार्थना कर रहे हैं।
 
श्लोक 42:  हे भगवन्, आपके न तो शत्रु हैं न मित्र। अत: आप सबों के लिए समान हैं। आप पापकर्मों के द्वारा कलुषित नहीं होते और आपका दिव्य रूप सदैव भौतिक सृष्टि से परे है। आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, क्योंकि आप सर्वव्यापी हैं, अत: आप वासुदेव कहलाते हैं। हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 43:  महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार प्रचेताओं द्वारा सम्बोधित तथा पूजित होकर शरणागतों के रक्षक भगवान् ने कहा, “तुमने जो कुछ माँगा है, वह पूरा हो।” तत्पश्चात् कभी न पराजित होनेवाले भगवान् ने विदा ली। प्रचेतागण उनसे विलग नहीं होना चाह रहे थे, क्योंकि उन्होंने जी-भर कर उन्हें नहीं देखा था।
 
श्लोक 44:  तत्पश्चात् सभी प्रचेता समुद्र के जल से बाहर निकल आये। तब उन्होंने देखा कि पृथ्वी (स्थल) पर सारे वृक्ष बढक़र काफी ऊँचे हो चुके हैं मानो वे स्वर्ग के मार्ग को रोकना चाहते हों। इन वृक्षों ने सारे पृथ्वीतल को आच्छादित कर रखा था। उस समय प्रचेता अत्यन्त कुपित हुए।
 
श्लोक 45:  हे राजन्, प्रलय के समय शिवजी क्रोध में आकर अपने मुख से अग्नि तथा वायु छोड़ते हैं। प्रचेताओं ने भी पृथ्वीतल को पूर्णत: वृक्षरहित करने के लिए अपने मुखों से अग्नि तथा वायु निकाली।
 
श्लोक 46:  यह देखकर कि पृथ्वी के सारे वृक्ष जलकर राख हो रहे हैं, ब्रह्माजी तुरन्त राजा बर्हिष्मान् के पुत्रों के पास आये और उन्होंने तर्कपूर्ण शब्दों से उन्हें शान्त किया।
 
श्लोक 47:  बचे हुए वृक्षों ने प्रचेताओं से डर कर ब्रह्मा की राय से अपनी कन्या को लाकर तुरन्त उन्हें दे दिया।
 
श्लोक 48:  ब्रह्मा के आदेश से समस्त प्रचेताओं ने उस कन्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। इस कन्या के गर्भ से ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने जन्म लिया। दक्ष को मारिष के गर्भ से इसलिए जन्म लेना पड़ा, क्योंकि उसने महादेवजी (शिवजी) की आज्ञा का उल्लंघन तथा अनादर किया था। फलत: उसे दो बार शरीर त्याग करना पड़ा।
 
श्लोक 49:  उसका पूर्व शरीर विनष्ट हो चुका था, किन्तु उसी दक्ष ने परमेश्वर की प्रेरणा से चाक्षुष मन्वन्तर में समस्त मनोवांछित जीवों की सृष्टि की।
 
श्लोक 50-51:  जन्म लेने के बाद अपनी अद्वितीय शारीरिक कान्ति के कारण दक्ष ने अन्य सबों की शारीरिक कान्ति को ढाँप दिया। चूँकि वह सकाम कार्य करने में अत्यन्त पटु (दक्ष) था, इसलिए उसका नाम दक्ष पड़ा। इसलिए ब्रह्मा ने उसे जीवों को उत्पन्न करने तथा उनके पालन के कार्य में लगा दिया। समय आने पर दक्ष ने अन्य प्रजापतियों को भी उत्पत्ति तथा पालन के कार्य में नियुक्त कर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥