श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 10

 
श्लोक
ये तु मां रुद्रगीतेन सायं प्रात: समाहिता: ।
स्तुवन्त्यहं कामवरान्दास्ये प्रज्ञां च शोभनाम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो लोग; तु—लेकिन; माम्—मुझको; रुद्र-गीतेन—रुद्र गीत द्वारा; सायम्—संध्या समय; प्रात:—प्रात:काल; समाहिता:—सावधान रहकर; स्तुवन्ति—प्रार्थना करते हैं; अहम्—मैं; काम-वरान्—इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए समस्त वर, अभीष्ट वरदान; दास्ये—प्रदान करूँगा; प्रज्ञाम्—बुद्धि; च—भी; शोभनाम्—दिव्य ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग शिवजी द्वारा प्रणीत स्तुति से प्रात: तथा सायंकाल मेरी प्रार्थना करेंगे, उन्हें मैं वर प्रदान करूँगा। इस तरह वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के साथ-साथ सद्बुद्धि भी प्राप्त कर सकेंगे।
 
तात्पर्य
 सद्बुद्धि का अर्थ है भगवान् के धाम को वापस जाना। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१०.१०) में हुई है—
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो निरन्तर मेरी भक्ति करते तथा प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकें।”

जो अपनी विविध इच्छाओं की पूर्ति के उद्देश्य से भगवान् की प्रार्थना करता है, उसे यह जान लेना चाहिए कि इच्छा की चरमपूर्ति भगवान् के धाम को वापस जाना है। इस श्लोक में इंगित किया गया कि जो राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्र प्रचेताओं के कार्यकलापों का स्मरण करता है उसका कल्याण और उद्धार होगा। अत: राजा के उन पुत्रों के लिए क्या कहना जो भगवान् से प्रत्यक्ष जुड़े हुए हैं? परम्परा पद्धति की यही रीति है। यदि हम आचार्यों का अनुसरण करते हैं, तो हमें अपने पूर्ववर्तियों जैसा लाभ प्राप्त होता है। यदि कोई अर्जुन के निर्णयों का अनुसरण करता है, तो समझो कि वह भगवान् से सीधे भगवद्गीता सुन रहा है। प्रत्यक्ष भगवान् से भगवद्गीता सुनने तथा अर्जुन जैसे महापुरुष का, जिसने भगवद्गीता पहले भगवान् के मुख से सुनी थी, अनुसरण करने में कोई अन्तर नहीं होता। कभी-कभी मूर्ख लोग तर्क करते हैं कि इस समय कृष्ण उपस्थित नहीं हैं, इसलिए उनसे प्रत्यक्ष उपदेश प्राप्त नहीं किया जा सकता। ऐसे मूर्ख यह नहीं जानते कि भगवद्गीता के प्रत्यक्ष सुनने तथा इसके पढऩे में तब तक कोई अन्तर नहीं है जब तक इसे उसी रूप में स्वीकार किया जाता है, जिस रूप में इसे भगवान् ने कहा था। किन्तु यदि कोई अपनी अधूरी विवेचना से भगवद्गीता समझना चाहता है, तो वह भगवद्गीता के रहस्यों को नहीं समझ सकता, भले ही लौकिक दृष्टि में वह कितना ही बड़ा विद्वान् क्यों न हो।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥