श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 11

 
श्लोक
यद्यूयं पितुरादेशमग्रहीष्ट मुदान्विता: ।
अथो व उशती कीर्तिर्लोकाननु भविष्यति ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—चूँकि; यूयम्—तुम लोगों ने; पितु:—पिता की; आदेशम्—आज्ञा; अग्रहीष्ट—शिरोधार्य की है; मुदा-अन्विता:—अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; अथो—अत:; व:—तुम्हारी; उशती—आकर्षण, कमनीय; कीर्ति:—महिमा; लोकान् अनु—सारे ब्रह्माण्ड भर में; भविष्यति—सम्भव हो सकेगी, फैल जाएगी ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि तुम लोगों ने अपने अन्त:करण से प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता की आज्ञा अत्यन्त श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य की है और उसका पालन किया है, अत: तुम्हारे आकर्षक गुण संसार-भर में सराहे जाएँगे।
 
तात्पर्य
 चूँकि जीव भगवान् का भिन्नांश है, अत: उसे थोड़ी सी स्वतंत्रता प्राप्त है। कभी-कभी अल्पबुद्धि व्यक्ति पूछते हैं कि यद्यपि सभी प्राणी भगवान् के अधीन में हैं, किन्तु मनुष्य को कष्ट में क्यों रखा जाता है। अति अल्प स्वतंत्रता प्राप्त होने से जीव चाहे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे अथवा उल्लंघन कर दे। यदि वह आज्ञापालन
करता है, तो वह सुखी रहता है और यदि नहीं करता तो दुखी होता है। अत: जीव स्वयं सुख या दुख को जन्म देता है। परमेश्वर किसी पर इन्हें लादता नहीं। परमेश्वर ने प्रचेताओं की प्रशंसा की क्योंकि उन्होंने अपने पिता की आज्ञा श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य की थी। फलत: भगवान् ने राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रों को आशीर्वाद दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥