श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 13

 
श्लोक
कण्डो: प्रम्‍लोचया लब्धा कन्या कमललोचना ।
तां चापविद्धां जगृहुर्भूरुहा नृपनन्दना: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
कण्डो:—कण्डु मुनि की; प्रम्लोचया—प्रम्लोचा नाम की अप्सरा से; लब्धा—प्राप्त किया; कन्या—पुत्री; कमल-लोचना— कमल जैसे नेत्रों वाली; ताम्—उसको; च—भी; अपविद्धाम्—छोड़ी हुई; जगृहु:—स्वीकार किया; भूरुहा:—वृक्ष; नृप नन्दना:—हे राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रो! ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रो, प्रम्लोचा नामक अप्सरा ने कण्डु की कमलनयनी कन्या को जंगली वृक्षों की रखवाली में छोड़ दिया और फिर वह स्वर्गलोक को चली गई। यह कन्या कण्डु ऋषि तथा प्रम्लोचा नामक अप्सरा के संयोग से उत्पन्न हुई थी।
 
तात्पर्य
 जब भी कोई ऋषि भौतिक शक्ति के लिए कठोर तपस्या करता है, तो स्वर्ग का राजा इन्द्र ईर्ष्यालु हो उठता है। सभी देवताओं पर संसार का कार्य चलाने के लिए उत्तरदायित्व है और वे पुण्यकर्मों के कारण अत्यन्त योग्य होते हैं। यद्यपि वे सामान्य जीव हैं, किन्तु वे ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र तथा वरुण जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण पदों को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। जैसाकि इस संसार की रीति है, स्वर्ग का राजा इन्द्र किसी भी ऋषि के द्वारा कठोर तपस्या करने पर ईर्ष्या करने लगता है। यह सारा संसार ऐसी ही ईर्ष्या से पूर्ण है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ोसी से भयभीत रहता है। प्रत्येक व्यापारी अपने संगियों से भयभीत रहता है, क्योंकि यह संसार समस्त प्रकार के ईर्ष्यालु व्यक्तियों का कर्मक्षेत्र है, जो यहाँ पर भगवान् के ऐश्वर्य से स्पर्धा करने के लिए आये हुए हैं। इस प्रकार इन्द्र कण्डु द्वारा सम्पन्न कठोर
तपस्या से अत्यन्त भयभीत था और उसने उसके व्रत तथा तपस्या को खण्डित करने के लिए प्रम्लोचा को भेजा। ऐसी ही घटना विश्वामित्र के साथ भी घटित हुई थी। शास्त्रों की अन्य घटनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि इन्द्र सदा से ईर्ष्यालु रहा है। जब राजा पृथु इन्द्र से बढक़र विभिन्न यज्ञ सम्पन्न कर रहा था, तो इन्द्र अत्यन्त ईर्ष्यालु हो उठा और उसने राजा पृथु के यज्ञ में गड़बड़ी मचाई। इसकी व्याख्या पिछले अध्यायों में की जा चुकी है। इन्द्र को कण्डु ऋषि का व्रत भंग करने में सफलता प्राप्त हुई, क्योंकि ऋषि प्रम्लोचा नामक अप्सरा की सुन्दरता से मोहित हो गया और उससे एक कन्या को जन्म दिया। यहाँ पर इस कन्या को कमलनयनी तथा अत्यन्त सुन्दरी कहा गया है। अपने उद्देश्य में सफल होकर प्रम्लोचा नवजात शिशु को वृक्षों की निगरानी में छोडक़र स्वर्ग लौट गई। सौभाग्यवश वृक्षों ने शिशु का पालन-पोषण करने की सहमति दे दी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥