श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 16

 
श्लोक
अपृथग्धर्मशीलानां सर्वेषां व: सुमध्यमा ।
अपृथग्धर्मशीलेयं भूयात्पत्‍न्यर्पिताशया ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
अपृथक्—किसी अन्तर के बिना; धर्म—व्यापार; शीलानाम्—जिसका चरित्र; सर्वेषाम् व:—तुम सबों का; सु-मध्यमा—पतली कमर वाली लडक़ी; अपृथक्—समान; धर्म—व्यापार; शीला—अच्छे आचरण वाली; इयम्—यह; भूयात्—हो; पत्नी—पत्नी; अर्पित-आशया—पूर्णतया समर्पित ।.
 
अनुवाद
 
 तुम सभी भाई भक्त तथा अपने पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने के कारण समान स्वभाव वाले हो। यह लडक़ी भी उसी तरह की है और तुम सबके प्रति समर्पित है। अत: यह लडक़ी तथा तुम प्राचीनबर्हिषत् के सारे पुत्र एक ही नियम से बँधे होकर समान पद पर स्थित हो।
 
तात्पर्य
 वैदिक नियमों के अनुसार कोई स्त्री एक से अधिक पति वाली नहीं हो सकती, किन्तु पुरुष कई पत्नियों वाला हो सकता है। किन्तु विशेष उदाहरणों में स्त्री के भी एक से अधिक पति हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डवों के साथ हुआ था। इसी प्रकार भगवान् ने प्राचीनबर्हिषत् के पुत्रों को कण्डु ऋषि तथा प्रम्लोचा से उत्पन्न कन्या के साथ विवाह करने के लिए आदेश दिया। विशेष दशाओं में कन्या को एक से अधिक पुरुषों के साथ विवाह करने की अनुमति प्राप्त है, यदि वह सभी पतियों के साथ समान व्यवहार कर सके। सामान्य स्त्री के लिए ऐसा सम्भव नहीं है। विशेष योग्यता प्राप्त स्त्री को ही एक से अधिक पति करने की छूट है। इस कलिकाल में ऐसी सन्तुलित स्त्री खोज पाना कठिन है। शास्त्र के अनुसार—कलौ पञ्च विवर्जयेत्। इस युग में स्त्री अपने देवर के साथ ब्याह नहीं कर सकती। किन्तु आज भी भारत के कुछ पहाड़ी भागों में यह प्रथा चालू है। भगवान् का कथन है—अपृथग्धर्मशीलेयं भूयात् पत्न्यर्पिताशया। भगवान् के आशीर्वाद से सब कुछ सम्भव है। भगवान् ने उस कन्या को विशेष आशीर्वाद दिया कि वह कन्या समभाव से सभी भाइयों के प्रति समर्पित रहे। अपृथग्धर्म अर्थात् “उद्देश्य में किसी अन्तर के बिना कर्तव्य” की शिक्षा भगवद्गीता में दी गई है। भगवद्गीता तीन भागों में विभाजित है—कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग। योग शब्द का अर्थ है “भगवान् की ओर से काम करना।” जैसाकि भगवद्गीता से (३.९) प्रमाणित है—
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ॥

“श्रीविष्णु के लिए यज्ञ रूप में कर्म करना अनिवार्य है, अन्यथा कर्म मनुष्य को इस जगत से बाँध लेता है। अत: हे कुन्तीपुत्र! उनकी प्रसन्नता के लिए संस्तुत कार्य करो और इस प्रकार करने से तुम सदा अनासक्त तथा बन्धन से मुक्त रहोगे।”

मनुष्य यज्ञ पुरुष भगवान् को प्रसन्न करने के लिए अपने कर्तव्यों के अनुसार कार्य कर सकता है। यही अपृथग्धर्म कहलाता है। शरीर के विभिन्न अंग भिन्न-भिन्न प्रकार से कार्य कर सकते हैं, किन्तु मूल उद्देश्य तो सम्पूर्ण शरीर का पालन होता है। इसी प्रकार यदि हम भगवान् को प्रसन्न करने के लिए कार्य करें तो हम देखेंगे कि सबों को प्रसन्न किया जा सकता है। हमें प्रचेताओं का अनुसरण करना चाहिए जिनका एकमात्र उद्देश्य परमेश्वर को प्रसन्न करना था। यही अपृथग्धर्म कहलाता है। भगवद्गीता के अनुसार (१८.६६)—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—सभी प्रकार के धर्मों को त्याग कर मेरी शरण ग्रहण करो। श्रीकृष्ण का यही उपदेश है। हमारा एकमात्र उद्देश्य भगवान् को प्रसन्न करना है। यही एकत्व या अभिन्नता अथवा अपृथग्धर्म है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥