श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 24

 
श्लोक
नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे ।
वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार; विशुद्ध-सत्त्वाय—आपको जिसका अस्तित्व समस्त भौतिक प्रभाव से मुक्त है; हरये—भक्तों के कष्टों को हरने वाला; हरि-मेधसे—जिसका मस्तिष्क बद्धजीव के उद्धार हेतु कार्य करता है; वासुदेवाय—सर्वव्यापी भगवान् को; कृष्णाय— कृष्ण को; प्रभवे—प्रभाव को बढ़ाने वाला; सर्व-सात्वताम्—सभी प्रकार के भक्तों का ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि आपका अस्तित्व समस्त भौतिक प्रभावों से पूर्णतया स्वतंत्र है। आप सदैव अपने भक्तों के क्लेशों को हर लेते हैं, क्योंकि आपका मस्तिष्क जानता है कि ऐसा किस प्रकार करना चाहिए। आप परमात्मा रूप में सर्वत्र रहते हैं, अत: आप वासुदेव कहलाते हैं। आप वसुदेव को अपना पिता मानते हैं और आप कृष्ण नाम से विख्यात हैं। आप इतने दयालु हैं कि अपने समस्त प्रकार के भक्तों के प्रभाव को बढ़ाते हैं।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में कहा गया है कि दृश्य जगत की सृष्टि, पालन तथा संहार के उद्देश्य से (गृहीतमाया गुणविग्रहाय ) भगवान् तीन प्रकार के शरीर (ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव) धारण करते है। भौतिक जगत के तीन प्रमुख देव (ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव) गुण अवतार कहलाते हैं। भगवान् के अनेक प्रकार के अवतार हैं, किन्तु इस जगत में पहला अवतार ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर (शिव) के रूप में हुआ। इनमें से ब्रह्मा तथा शिव भौतिक शरीर धारण करते हैं, किन्तु भगवान् विष्णु भौतिक शरीर स्वीकार नहीं करते, फलत: उन्हें विशुद्ध-सत्त्व कहा जाता है। उनका अस्तित्व प्रकृति के तीनों गुणों के कल्मष से सर्वथा मुक्त है। अत: विष्णु को ब्रह्मा तथा शिव की कोटि का नहीं मानना चाहिए। शास्त्र हमें ऐसा करने से वर्जित करते हैं।
यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादि दैवतै:।

समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम् ॥

जो भगवान् विष्णु को ब्रह्मा या शिव जैसे देवों की कोटि में मानता है या ब्रह्मा तथा शिव को विष्णु के तुल्य मानता है उसे पाषण्डी (श्रद्धाविहीन, विश्वास न करने वाला) मानना चाहिए। अत: इस श्लोक में विष्णु को नमो विशुद्धसत्त्वाय के रूप से पृथक् किया गया है। हमारे समान जीवात्मा होते हुए भी ब्रह्माजी अपने पुण्यकर्मों के कारण महान् हैं, इसीलिए उन्हें ब्रह्मा का उच्च पद प्राप्त है। शिवजी वास्तव में जीवात्मा जैसे नहीं हैं, किन्तु वे भगवान् नहीं हैं। उनकी स्थिति भगवान्—जीवात्मा विष्णु तथा ब्रह्मा के बीचोंबीच है। अत: ब्रह्म-संहिता (५.४५) में शिवजी की व्याख्या इस प्रकार की गई है—

क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात् सञ्जायते न हि तत: पृथगस्ति हेतो:।

य: शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद् गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

शिवजी को दधि के समान माना गया है। दधि रूपांतरित दूध ही तो होता है फिर भी उसे दूध नहीं माना जाता। इसी प्रकार शिवजी भगवान् विष्णु की लगभग सभी शक्तियों को धारण करते हैं और जीव के गुणों से भी ऊपर हैं, किन्तु वे विष्णु के सर्वथा समान नहीं हैं जिस प्रकार दधि रूपांतरित दूध होते हुए भी दूध के समान नहीं होता।

यहाँ पर भगवान् को वासुदेवाय कृष्णाय भी कहा गया है। कृष्ण आदि भगवान् हैं और सारे विष्णु उनके स्वांश या कला हैं। स्वांश को अंश भी कहते हैं। सभी विष्णु तत्त्व स्वांश हैं। कृष्ण को वासुदेव कहते हैं, क्योंकि वे इस संसार में वसुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसी प्रकार वे देवकीनन्दन, यशोदानन्दन, नन्दनन्दन आदि कहलाते हैं।

भगवान् अपने भक्तों के प्रभाव को बढ़ाने में बारम्बार रुचि लेते हैं। अत: यहाँ पर उन्हें प्रभवे सर्वसात्वताम् कहा गया है। सात्वत जाति वैष्णवों अर्थात् भगवान् के शुद्ध भक्तों का एक समुदाय है। भगवान् की शक्तियाँ असीम हैं और वे चाहते हैं कि उनके भक्तों को भी असीम शक्तियाँ प्राप्त हों। अत: भगवद्भक्त अन्य जीवों से सदैव भिन्न होता है।

हरि शब्द का अर्थ है समस्त क्लेशों का हरण करने वाला तथा हरिमेधसे का अर्थ है कि भगवान् बद्धजीव को माया के चंगुल से छुड़ाने के लिए सदैव योजना बनाते रहते हैं। भगवान् इतने दयालु हैं कि बद्धजीवों के उद्धार के लिए स्वयं अवतरित होते हैं और जब भी वे आते हैं, अपनी योजनाएँ बनाते हैं।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

“भक्तजनों का उद्धार, दुष्टों का नाश तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिए मैं युगयुग में प्रकट होता हूँ।” (भगवद्गीता ४.८)।

चूँकि भगवान् समस्त बद्धजीवों का माया के चंगुल से उद्धार करते हैं इसलिए वे हरिमेधस् कहलाते हैं। अवतारों की सूची में कृष्ण को परम तथा आदि ईश्वर कहा गया है— एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।

इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥

(भागवत १.३.२८) जब इस भौतिक संसार में भगवद्भक्त देवता असुरों द्वारा पीडि़त किये जाते हैं, तो आदि भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥