श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 26

 
श्लोक
नम: कमलकिञ्जल्कपिशङ्गामलवाससे ।
सर्वभूतनिवासाय नमोऽयुङ्‌क्ष्महि साक्षिणे ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार; कमल-किञ्जल्क—कमल पुष्प के केसर के समान; पिशङ्ग—पीला; अमल—स्वच्छ; वाससे—उसको जिसका वस्त्र; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; निवासाय—आश्रय को; नम:—नमस्कार; अयुङ्क्ष्महि—करने दो; साक्षिणे—परम साक्षी को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आपके द्वारा धारण किया गया वस्त्र कमल पुष्प के केसर के समान पीले रंग का है, किन्तु यह किसी भौतिक पदार्थ का बना हुआ नहीं है। प्रत्येक हृदय में निवास करने के कारण आप समस्त जीवों के समस्त कार्यों के प्रत्यक्ष साक्षी हैं। हम आपको पुन:पुन: सादर नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में भगवान् के वस्त्र तथा उनकी सर्वव्यापकता का वर्णन हुआ है। भगवान् पीले रंग का वस्त्र धारण करते हैं, किन्तु उसे कभी भौतिक नहीं समझना चाहिए। उनके वस्त्र भी भगवान् हैं। वे भगवान् से अभिन्न हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक हैं।
सर्वभूतनिवासाय शब्द और आगे स्पष्ट करता है कि भगवान् किस प्रकार प्रत्येक हृदय में वास करते हैं और बद्धजीव के सारे कार्यों के प्रत्यक्ष साक्षी का कार्य करते हैं। इस जगत में बद्धजीव इच्छाएँ रखते है और इन्हीं के अनुसार कार्य करते हैं। इन सारे कार्यों को भगवान् देखते रहते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता द्वारा (१५.१५) भी होती है—सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—“मैं सबों के हृदय में आसीन हूँ और मुझी से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न हैं।” भगवान् प्रत्येक प्राणी के हृदय में उपस्थित हैं और जीव को बुद्धि प्रदान करते हैं। जीव की इच्छाओं के अनुसार ही भगवान् उसे स्मरण या विस्मरण कराते रहते हैं। यदि जीव आसुरी होता है और भगवान् को भूलना चाहता है, तो भगवान् उसे ऐसी बुद्धि देते हैं कि वह उन्हें सदैव भूला रहे। इसी प्रकार जब भक्त भगवान् की सेवा करना चाहता है, तो परमात्मा स्वरूप भगवान् उसे बुद्धि प्रदान करते हैं कि वह भक्ति में प्रगति करे। भगवान् हमारे सारे कार्यों के साक्षी बने रहते हैं और हमारी इच्छाओं को अनुभव करते हैं। परमेश्वर हमें इच्छानुसार कार्य करने की सुविधाएँ प्रदान करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥