श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 30

 
श्लोक
असावेव वरोऽस्माकमीप्सितो जगत: पते ।
प्रसन्नो भगवान् येषामपवर्गगुरुर्गति: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
असौ—उस; एव—निश्चय ही; वर:—वर; अस्माकम्—हमारा; ईप्सित:—इच्छित; जगत:—ब्रह्माण्ड के; पते—हे स्वामी; प्रसन्न:—प्रसन्न, तुष्ट; भगवान्—भगवान्; येषाम्—जिसके साथ; अपवर्ग—दिव्य प्रेमाभक्ति का; गुरु:—शिक्षक; गति:— जीवन का चरम लक्ष्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे जगत् के स्वामी, आप भक्तियोग के वास्तविक शिक्षक हैं। हमें सन्तोष है कि हमारे जीवन के परमलक्ष्य आप हैं और हम प्रार्थना करते हैं कि आप हम पर प्रसन्न हों। यही हमारा अभीष्ट वर है। हम आपकी पूर्ण प्रसन्नता के अतिरिक्त और कुछ भी कामना नहीं करते।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक के अपवर्ग गुरुर्गति: शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार (१.२.११) परमेश्वर ही परम सत्य का चरम तथ्य है—ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते। परम सत्य तीन प्रकार से अनुभव किया जाता है—निर्गुण ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्। अपवर्ग का अर्थ “मोक्ष” है। पवर्ग का अर्थ है “भौतिक संसार।” इस संसार में मनुष्य सदैव कठोर श्रम करता है, किन्तु अन्त में निराश हो जाता है। तब उसकी मृत्यु हो जाती और पुन: कठोर श्रम करने के लिए उसे अन्य शरीर प्राप्त होता है। भौतिक संसार का यही चक्र है। अपवर्ग इसका विपरीत है।
इसमें मनुष्य कुत्ते-बिल्लियों की तरह कठोर श्रम न करके भगवान् के धाम को वापस जाता है। मोक्ष का प्रारम्भ परमेश्वर के ब्रह्मतेज में मिल जाने से होता है। यह ज्ञानी सम्प्रदाय वालों का विचार है, किन्तु भगवान् का साक्षात्कार इससे बड़ी चीज है। जब भक्त समझता है कि भगवान् प्रसन्न हैं, तो मोक्ष अर्थात् ब्रह्मतेज में मिलना कठिन नहीं होता। जिस प्रकार सूर्यप्रकाश से सूर्य तक पहुँचा जाता है, उसी तरह मनुष्य को निर्गुण ब्रह्मतेज के माध्यम से भगवान् के पास पहुँचना होता है। यदि कोई भगवान् को प्रसन्न कर ले तो भगवान् के निर्गुण तेज में मिल जाना कठिन नहीं रह जाता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥