श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 31

 
श्लोक
वरं वृणीमहेऽथापि नाथ त्वत्परत: परात् ।
न ह्यन्तस्त्वद्विभूतीनां सोऽनन्त इति गीयसे ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
वरम्—वर; वृणीमहे—माँगेंगे; अथ अपि—अत:; नाथ—हे स्वामी; त्वत्—तुमसे (आपसे); परत: परात्—प्रकृति आदि से परे; न—नहीं; हि—निश्चय ही; अन्त:—अन्त; त्वत्—तुम्हारे; विभूतीनाम्—ऐश्वर्य का; स:—वह (तुम); अनन्त:—अनन्त; इति— इस प्रकार; गीयसे—विख्यात हो ।.
 
अनुवाद
 
 अत: हे स्वामी, हम आपसे वर देने के लिए प्रार्थना करेंगे, क्योंकि आप समस्त दिव्य प्रकृति से परे हैं और आपके ऐश्वर्यों का कोई अन्त नहीं है। अत: आप अनन्त नाम से विख्यात हैं।
 
तात्पर्य
 प्रचेताओं को भगवान् से कोई वर माँगने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि भक्तजन तो भगवान् की उपस्थिति मात्र से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। ध्रुव महाराज ने भगवान् का दर्शन करने के लिए कठिन तपस्या की थी और वे भगवान् से वर प्राप्त करना चाहते थे। वे अपने पिता का सिंहासन—या उससे भी श्रेष्ठतर पद—प्राप्त करना चाहते थे, किन्तु जब भगवान् उनके समक्ष उपस्थित हुए तो वे सब कुछ भूल गये। उन्होंने यही कहा, “हे स्वामी, मैं आपसे कोई वर नहीं चाहता।” भक्त की यही वास्तविक स्थिति होती है। भक्त तो भगवान् के समक्ष रहना चाहता है—चाहे इस लोक में हो या अन्यत्र—और उनकी सेवा में लगे रहना चाहता है। भक्तों के लिए यही चरम लक्ष्य तथा वर है।
भगवान् ने प्रचेताओं से वर माँगने के लिए कहा था, अत: उन्होंने कहा, “हम कौन सा वर माँगें? भगवान् अनन्त हैं, अत: वर भी अनन्त हैं।” तात्पर्य यह कि यदि कोई वर माँगता है, तो उसे अनन्त वर माँगने चाहिए। इस श्लोक के त्वत् परत: शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। भगवान् तो परत: परात् हैं। पर शब्द का अर्थ है—इस भौतिक जगत से परे अर्थात् दिव्य। निर्विशेष ब्रह्मतेज इस जगत से परे है और इसे परं पद कहा जाता है। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदम् (भागवत १०.२.३२)। भगवान् के निर्विशेष तेज में मिल जाना परं पदम् कहलाता है, किन्तु इससे भी उच्च दिव्य पद होता है, वह है भगवान् की संगति। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते (भागवत १.२.११)। परम सत्य का बोध पहले निर्विशेष ब्रह्म, फिर परमात्मा तथा अन्त में भगवान् के रूप में होता है। इस तरह भगवान् परत: परात् हैं, अर्थात् ब्रह्म तथा परमात्मा के साक्षात्कार से ऊपर हैं। इस प्रसंग में जीव गोस्वामी इंगित करते हैं कि परत: परात् का अर्थ है “सर्वश्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ।” सर्वश्रेष्ठ तो आध्यात्मिक जगत है और यह ब्रह्म कहलाता है। किन्तु भगवान् तो परब्रह्म कहलाते हैं, अत: परत: परात् का अर्थ है “ब्रह्म-साक्षात्कार से श्रेष्ठ।”

जैसाकि अगले श्लोकों में बताया गया है, प्रचेताओं की योजना कुछ ऐसी माँग प्रस्तुत करने की थी जो अनन्त हो। भगवान् की लीलाएँ, गुण, रूप तथा नाम सभी अनन्त हैं। इन सबका कोई अन्त नहीं है। किन्तु यदि सारे जीव परमेश्वर की अनन्त शक्तियों को सुनने में लग जाँय तो वे अनन्त से सीधे जुड़ जाते हैं। श्रवण तथा कीर्तन के द्वारा अनन्त का ऐसा ज्ञान अनन्त बन जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥