श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 35

 
श्लोक
यत्रेड्यन्ते कथा मृष्टास्तृष्णाया: प्रशमो यत: ।
निर्वैरं यत्र भूतेषु नोद्वेगो यत्र कश्चन ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जहाँ; ईड्यन्ते—पूजा की जाती है या चर्चा चलती है; कथा:—कथा; मृष्टा:—शुद्ध; तृष्णाया:—भौतिक इच्छाओं की; प्रशम:—तुष्टि; यत:—जिससे; निर्वैरम्—वैर का न होना; यत्र—जहाँ; भूतेषु—जीवों में; न—नहीं; उद्वेग:—भय; यत्र—जहाँ; कश्चन—किसी प्रकार का, कोई ।.
 
अनुवाद
 
 जब भी दिव्य लोक की कथाओं की चर्चा चलती है, श्रोतागण, भले ही क्षण-भर के लिए क्यों न हो, समस्त भौतिक तृष्णाएँ भूल जाते हैं। यही नहीं, आगे से वे एक दूसरे से न तो वैर करते हैं, न किसी कुण्ठा या भय से ग्रस्त होते हैं।
 
तात्पर्य
 वैकुण्ठ का अर्थ है “कुण्ठा से रहित” और भौतिक जगत का अर्थ है कुण्ठा से पूर्ण। जैसाकि प्रह्लाद महाराज ने कहा है—सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात्। जिन जीवात्माओं ने इस जगत को अपना आवास बनाया है वे सदैव कुण्ठा से भरे रहते हैं। जब शुद्ध भक्तों के द्वारा भगवान् की पवित्र कथाएँ कही जाती हैं, तो कोई भी स्थान वैकुण्ठ बन जाता है। यह श्रवणं कीर्तनं विष्णो: की विधि है, जिसमें भगवान् विष्णु के विषय में कीर्तन एवं श्रवण किया जाता है। भगवान् स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं—
नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे योगिनां हृदयेषु वा।

तत्र तिष्ठामि नारद यत्र गायन्ति मद्भक्ता: ॥

“हे नारद! न तो मैं अपने निवास वैकुण्ठ में रहता हूँ, न योगियों के हृदय में रहता हूँ। मैं तो उस स्थान में वास करता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरे पवित्र नाम का कीर्तन करते हैं और मेरे रूप, लीलाओं तथा गुणों की चर्चा चलाते हैं।” दिव्य उच्चारण में भगवान् की उपस्थिति के कारण वैकुण्ठलोक का वातावरण प्रबुद्ध होता है। यह वातावरण भय तथा कुण्ठा से मुक्त होता है। इसमें एक जीव दूसरे जीव से डरता नहीं। भगवान् के पवित्र नाम तथा गुणों के श्रवण से मनुष्य पुण्यकर्म करने लगता है। शृण्वतां स्वकथा: कृष्ण पुण्यश्रवणकीर्तन: (भागवत १.२.१७)। इस प्रकार उसकी भौतिक तृष्णाएँ तुरन्त समाप्त हो जाती हैं। कृष्णभावनामृत-संघ द्वारा चलाया गया यह संकीर्तन-आन्दोलन वैकुण्ठलोक की सृष्टि करने के लिए है, जहाँ कोई कुण्ठा नहीं है। इसकी विधि है श्रवणं कीर्तनं विष्णो: द्वारा सारे संसार में प्रचार। भौतिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति अपने संगी से द्वेष करता है। जब तक मानव-समाज में हरे कृष्ण महामंत्र—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—का संकीर्तन यज्ञ नहीं होता तब तक उसमें पाशविक विद्वेष बना रहता है। फलत: प्रचेताओं ने सदैव भक्तों के समाज में रहने का निश्चय किया और इसे ही मानव-जीवन का सर्वश्रेष्ठ वर माना।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥