श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 4

 
श्लोक
दशवर्षसहस्रान्ते पुरुषस्तु सनातन: ।
तेषामाविरभूत्कृच्छ्रं शान्तेन शमयन् रुचा ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
दश-वर्ष—दस साल; सहस्र-अन्ते—एक हजार के अन्त में; पुरुष:—परम पुरुष; तु—तब; सनातन:—शाश्वत; तेषाम्— प्रचेताओं का; आविरभूत्—प्रकट हुआ; कृच्छ्रम्—कठिन तपस्या; शान्तेन—तुष्ट करते हुए; शमयन्—शान्त करते हुए; रुचा— अपने सौन्दर्य से ।.
 
अनुवाद
 
 प्रचेताओं द्वारा दस हजार वर्षों तक कठिन तपस्या किये जाने के बाद भगवान् तपस्या का फल देने के लिए उनके समक्ष अत्यन्त मनोहर रूप में प्रकट हुए। इससे प्रचेताओं को अपना श्रम सार्थक प्रतीत हुआ।
 
तात्पर्य
 दस हजार वर्षों तक तपस्या करते रहना बहुत सुखद प्रयास नहीं लगता, तो भी भक्तगण भगवान् की कृपा प्राप्त करने के लिए ऐसी तपस्याएँ करते हैं। उस काल में जब जीवन अत्यन्त दीर्घ होता था, लोग हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या कर सकते थे। कहा जाता है कि रामायण के रचयिता वाल्मीकि ने साठ हजार वर्षों तक ध्यान रूपी तपस्या की। भगवान् ने प्रचेताओं की तपस्या की सराहना की और अन्त में वे अत्यन्त मनोहर रूप में उनके समक्ष प्रकट हुए। इस प्रकार वे सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए और की गई अपनी तपस्या के कष्ट को भूल गए। भौतिक जगत में यदि कोई कठिन श्रम के बाद सफल होता है, तो वह अत्यधिक प्रसन्न होता है। इसी प्रकार भक्त भी भगवान् के संसर्ग में आते ही सारे श्रम तथा सारी तपस्या को भूल जाता है। यद्यपि ध्रुव महाराज केवल पाँच वर्ष के बालक थे, किन्तु उन्होंने सूखी पत्तियाँ खाकर, केवल जल पीकर तथा निराहार रहकर कठिन तपस्या की। इस तरह वे छ:मास के पश्चात् भगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन कर सके थे। जब उन्होंने भगवान् का दर्शन किया, तो वे अपनी सारी तपस्या भूल गये और कहा—स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि—“हे भगवान्! मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।”
असल में, ये तपस्याएँ सत्ययुग, द्वापर तथा त्रेतायुग में की गई थीं, इस कलियुग में नहीं। इस कलियुग में हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने से वही फल प्राप्त किया जा सकता है। चूँकि इस युग के लोग पतित हैं अत: भगवान् इतने दयालु हैं कि उनको वे सबसे सरल विधि-प्रदान करते हैं। हरे कृष्ण महामंत्र के जप मात्र से कोई भी वही परिणाम प्राप्त कर सकता है। जैसाकि भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने इंगित किया है, हम इतने अभागे हैं कि हम हरे कृष्ण महामंत्र—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण, हरे हरे /हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—का जप करने की ओर भी आकृष्ट नहीं होते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥