श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 10

 
श्लोक
किं जन्मभिस्त्रिभिर्वेह शौक्रसावित्रयाज्ञिकै: ।
कर्मभिर्वा त्रयीप्रोक्तै: पुंसोऽपि विबुधायुषा ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
किम्—क्या लाभ; जन्मभि:—जन्मों से; त्रिभि:—तीन; वा—अथवा; इह—इस संसार में; शौक्र—वीर्य से; सावित्र—दीक्षा से; याज्ञिकै:—पूर्ण ब्राह्मण बनने से; कर्मभि:—कर्म से; वा—अथवा; त्रयी—वेदों में; प्रोक्तै:—उपदिष्ट; पुंस:—मनुष्य को; अपि—भी; विबुध—देवताओं की; आयुषा—आयु से ।.
 
अनुवाद
 
 सुसंस्कारी मनुष्य के तीन प्रकार के जन्म होते हैं। पहला जन्म शुद्ध माता-पिता से होता है, जिसे वीर्य द्वारा जन्म (शौक्र) कहते हैं। दूसरा जन्म गुरु से दीक्षा लेते समय होता है और यह ‘सावित्र’ कहलाता है। तीसरा जन्म ‘याज्ञिक’ कहलाता है और यह भगवान् विष्णु की पूजा का अवसर मिलने पर होता है। ऐसे जन्म लेने के अवसर प्राप्त होने पर भी यदि किसी को किसी देवता की भी आयु मिल जाये और वह वस्तुत: भगवान् की सेवा में रत न हो तो सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार कर्म चाहे सांसारिक हों या आध्यात्मिक, यदि वे भगवान् को प्रसन्न करने हेतु न हों तो वे व्यर्थ हैं।
 
तात्पर्य
 शौक्र-जन्म शब्द का अर्थ है “वीर्यपात से जन्म लेना।” पशु भी इस प्रकार जन्म ले सकते हैं, किन्तु वैदिक सभ्यता के अनुसार शौक्र जन्म में से जन्मे मनुष्य में सुधार लाया जा सकता है। जन्म लेने के पूर्व अथवा माता-पिता के सम्पर्क के पूर्व गर्भाधान संस्कार होता है जिसका पालन किया जाना चाहिए। यह संस्कार उच्च जातियों के लिए, विशेष रूप से ब्राह्मणों के लिए संस्तुत है। शास्त्रों का कथन है कि यदि उच्च जातियाँ गर्भाधान संस्कार का पालन नहीं करतीं तो सारा वंश शूद्र बन जाता है।
यह भी कहा गया है कि इस कलियुग में गर्भाधान संस्कार न होने से प्रत्येक व्यक्ति शूद्र होता है। यही वैदिक पद्धति है। किन्तु पाञ्चरात्रिका पद्धति के अनुसार, यद्यपि गर्भाधान संस्कार के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति शूद्र है, किन्तु यदि किसी में कृष्णभक्त बनने की तनिक भी प्रवृत्ति है, तो उसे भक्ति के दिव्य पद तक उठने का अवसर मिलना चाहिए। हमारा कृष्णभावनामृत-आन्दोलन इसी पाञ्चरात्रिका विधि को अपनाता है जैसाकि श्रील सनातन गोस्वामी का उपदेश है—

यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रस विधानत:।

तथा दीक्षा विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम् ॥

“जिस प्रकार कांस्य धातु पारे के साथ मिलाये जाने पर सोने में बदल जाती है, उसी प्रकार एक पुरुष सोने के समान शुद्ध न होने पर भी केवल दीक्षा के द्वारा ब्राह्मण या द्विज बन सकता है” (हरिभक्ति विलास २.१२)। इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति उपयुक्त व्यक्ति द्वारा दीक्षित हो तो उसे तुरन्त द्विज माना जा सकता है। अत: हम अपने कृष्णभावनामृत-आन्दोलन में शिष्य को पहली दीक्षा देकर उसे हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने को कहते हैं। इस मंत्र को नियमित जपने तथा विधि-विधानों का पालन करते रहने से वह ब्राह्मण के रूप में दीक्षित होने के योग्य हो जाता है, क्योंकि जब तक कोई योग्य ब्राह्मण नहीं बन जाता उसे भगवान् विष्णु की पूजा करने की अनुमति नहीं दी जाती। यह याज्ञिक जन्म कहलाता है। हमारे कृष्णभानामृत-आन्दोलन में जब तक कोई दो बार दीक्षा ग्रहण नहीं कर लेता—पहली बार हरे कृष्ण जप द्वारा तथा दूसरी बार गायत्री मंत्र के जप द्वारा—तब तक उसे न तो रसोई में, न ही पूजाघर में प्रवेश करने दिया जाता है। किन्तु जब कोई उस पद को प्राप्त करता है, जिसमें वह अर्चा-विग्रह की पूजा कर सके तो उसके पूर्वजन्म पर ध्यान नहीं दिया जाता।

चण्डालोऽपि द्विजश्रेष्ठो हरिभक्तिपरायण:।

हरिभक्तिविहीनश्च द्विजोऽपि श्वपचाधम: ॥

“भले ही कोई चण्डाल के परिवार में क्यों न जन्म ले, यदि वह भगवद्भक्ति करता है, तो वह श्रेष्ठ ब्राह्मण बन जाता है। किन्तु यदि ब्राह्मण होकर भी वह भक्ति से शून्य है, तो वह अधम श्वपच (कुत्ता खाने वाला) के समान होता है।” यदि कोई व्यक्ति भक्ति में पारंगत है, तो चाहे वह चण्डाल कुल में क्यों न जन्म ले, शुद्ध हो जाता है। जैसाकि प्रह्लाद महाराज कहते हैं (भागवत ७.९.१०)—

विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।

यदि कोई ब्राह्मण हो और समस्त ब्राह्मण गुणों से युक्त हो यदि वह भगवान् की पूजा करने से विमुख होता है तो वह अधम समझा जाता है। किन्तु यदि कोई मनुष्य भगवान् की सेवा में आसक्त रहता है, तो वह महिमामंडित होता है भले ही वह चंाडाल कुल में क्यों न जन्मा हो। निस्सन्देह, ऐसा चण्डाल न केवल स्वयं को वरन् अपने परिवार के पुरखों को भी तार देता है। भक्ति के बिना गर्वीला ब्राह्मण अपना भी उद्धार नहीं कर सकता, उसका परिवार तो दूर रहा। शास्त्रों में कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ यह देखा जाता है कि ब्राह्मण भी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ तक बन गया है। और ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं जहाँ क्षत्रिय, वैश्य या अन्य निम्न कुल में उत्पन्न व्यक्ति अठारह वर्ष की अवस्था पा लेने पर व्यक्ति दीक्षा के द्वारा ब्राह्मण पद को प्राप्त कर सका है। अत: नारद मुनि कहते हैं (भागवत ७.११.३५)—

यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्।

यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥

यह तथ्य नहीं है कि ब्राह्मण कुल में उत्पन्न व्यक्ति स्वत: ब्राह्मण हो जाता है। उसके ब्राह्मण बनने का अच्छा अवसर रहता है, किन्तु जब तक वह ब्राह्मण-गुणों को पूरा नहीं कर लेता उसे ब्राह्मण नहीं स्वीकार किया जा सकता। दूसरी ओर, यदि किसी शूद्र व्यक्ति में भी ये ब्राह्मण गुण पाये जाते हैं, तो उसे तुरन्त ही ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए। इसकी पुष्टि के लिए भागवत, महाभारत, भरद्वाज संहिता, पंचरात्र तथा अन्य अनेक शास्त्रों में उदाहरण मिलते हैं।

जहाँ तक देवताओं की आयु का प्रश्न है, ब्रह्माजी के सम्बन्ध में कहा गया है (भगवद्गीता ८.१७)—

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु:।

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना: ॥

ब्रह्मा का एक दिन चतुर्युगों से एक हजार गुना बड़ा होता है (४३,२०,००० वर्ष)। ब्रह्मा की एक रात्रि भी इसी प्रकार होती है। ब्रह्मा ऐसे दिन-रात वाले एक सौ वर्षों तक जीवित रहता है। विबुधायुषा

शब्द सूचित करता है कि यदि किसी को दीर्घायु भी प्राप्त हो, किन्तु यदि वह भक्त नहीं है, तो उसका जीवन व्यर्थ है। जीवात्मा परमेश्वर का शाश्वत सेवक है और जब तक वह भक्ति नहीं करता, उसकी आयु, उत्तम जन्म, सत्कार्य तथा सभी कुछ व्यर्थ हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥