श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 13

 
श्लोक
श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थत: ।
सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मात्मद: प्रिय: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
श्रेयसाम्—शुभ कार्यों का; अपि—निश्चय ही; सर्वेषाम्—समस्त; आत्मा—आत्मा; हि—निश्चय ही; अवधि:—लक्ष्य; अर्थत:—वास्तव में; सर्वेषाम्—सभी; अपि—निश्चय ही; भूतानाम्—जीवों का; हरि:—भगवान्; आत्मा—परमात्मा; आत्म- द:—मूल पहचान प्रदान करने वाला; प्रिय:—प्रिय ।.
 
अनुवाद
 
 यथार्थ रूप में भगवान् ही समस्त आत्म-साक्षात्कार के मूल स्रोत हैं। फलत: समस्त शुभ कार्यों—कर्म, ज्ञान, योग तथा भक्ति—का लक्ष्य भगवान् हैं।
 
तात्पर्य
 जीवात्मा भगवान् की तटस्था शक्ति है और यह संसार बहिरंगा शक्ति है। ऐसी परिस्थिति में मनुष्य को यह समझना चाहिए कि भगवान् ही पदार्थ तथा आत्मा दोनों के मूल स्रोत हैं। इसकी व्याख्या भगवद्गीता (७.४-५) में की गई है—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥

“पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार—ऐसी ये सारी आठ प्रकार की अलग-अलग मेरी अपरा सकियाँ है। किन्तु हे महाबाहु अर्जुन! इस अपरा (जड़) प्रकृति के अतिरिक्त मेरी एक जीवरूप परा (चेतन) प्रकृति भी है, जो उन सभी जीवों से बनी है, जो भौतिक शक्ति से संघर्ष करते रहते हैं और ब्रह्माण्ड को बनाये रखते हैं।”

यह समग्र दृश्य जगत पदार्थ तथा आत्मा के संयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आत्मा वाला अंश जीव है और ये जीव ही प्रकृति या शक्ति के रूप में वर्णित हैं। जीव को कभी भी पुरुष या परम पुरुष नहीं कहा जाता, अत: जीव को परमात्मा से एकाकार करना कोरी अविद्या है। जीव तो परमेश्वर की तटस्था शक्ति है यद्यपि शक्ति तथा शक्तिमान में वास्तव में कोई अन्तर नहीं होता। जीव का धर्म है कि वह अपने वास्तविक रूप को पहचाने। जब वह ऐसा करता है, तो कृष्ण उसे भक्ति पद प्राप्त करने की सारी सुविधाएँ प्रदान करते हैं। यही जीवन की पूर्णता है। यह वैदिक उपनिषदों में इंगित हुआ है—

यमेवैष वृणुते तेन लब्ध्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्। भगवान् श्रीकृष्ण भी भगवद्गीता (१०.१०) में इसकी पुष्टि करते हैं—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो लोग मेरी सतत भक्ति तथा प्रेमपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ जिससे वे मुझ तक आ सकते हैं।” निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य को भक्तियोग पद तक पहुँचना चाहिए चाहे वह कर्मयोग, ज्ञानयोग या अष्टांग योग से शुभारम्भ क्यों न करे। जब तक भक्तियोग के पद को प्राप्त नहीं किया जाता, आत्म-साक्षात्कार या परम सत्य का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥