श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 17

 
श्लोक
यथा नभस्यभ्रतम:प्रकाशा
भवन्ति भूपा न भवन्त्यनुक्रमात् ।
एवं परे ब्रह्मणि शक्तयस्त्वमू
रजस्तम:सत्त्वमिति प्रवाह: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; नभसि—आकाश में; अभ्र—बादल; तम:—अंधकार; प्रकाशा:—तथा प्रकाश; भवन्ति—विद्यमान रहते हैं; भू-पा:—हे राजाओं; न भवन्ति—प्रकट नहीं होते; अनुक्रमात्—क्रम से; एवम्—इस प्रकार; परे—परम; ब्रह्मणि—ब्रह्म में; शक्तय:—शक्तियाँ; तु—तब; अमू:—वे; रज:—रजोगुण; तम:—तमोगुण; सत्त्वम्—सतोगुण; इति—इस प्रकार; प्रवाह:— प्राकट्य, प्रवाह ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजाओ, आकाश में कभी बादल, कभी अंधकार और कभी प्रकाश रहता है। इनका प्राकट्य एक क्रम से होता रहता है। इसी तरह सतो, रजो तथा तमोगुण परब्रह्म में क्रमश: शक्ति रूप में प्रकट होते हैं। कभी वे प्रकट होते हैं, तो कभी लुप्त होते हैं।
 
तात्पर्य
 अंधकार, प्रकाश तथा बादल कभी प्रकट होते हैं, तो कभी छिप जाते हैं, किन्तु उनके छिप जाने पर भी उनकी शक्ति बनी रहती है। आकाश में हमें कभी बादल दिखते हैं, तो कभी वर्षा और कभी हिमपात। कभी हम रात देखते हैं, तो कभी दिन और कभी प्रकाश देखते हैं, तो कभी अंधकार।इन सबका अस्तित्व सूर्य के कारण है, किन्तु सूर्य पर इन परिवर्तनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसी प्रकार यद्यपि भगवान् समग्र दृश्य जगत के मूल कारण हैं, किन्तु उन पर भौतिक संसार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (७.४) में हुई है—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

“भूमि, जल, अग्नि, वायु, शून्य, मन, बुद्धि तथा अहंकार—ये आठ मिलकर मेरी भिन्न भौतिक शक्तियों का निर्माण करते हैं।”

यद्यपि भौतिक तत्त्व भगवान् की शक्ति हैं, किन्तु वे पृथक्-पृथक् हैं। अत: भगवान् पर भौतिक दशाओं का प्रभाव नहीं पड़ता। वेदान्त-सूत्र पुष्टि करता है—जन्माद्यस्य यत:—इस संसार की सृष्टि, पालन तथा संहार परमेश्वर के अस्तित्व के कारण है। फिर भी भौतिक तंत्रों में परिवर्तनों का भगवान् पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसका संकेत प्रवाह शब्द से मिलता है। सूर्य सदैव तेजी से चमकता है, वह बादलों या अंधकार से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार भगवान् सदैव अपनी आध्यात्मिक शक्ति में उपस्थित रहते हैं और भौतिक प्रसर्जन से प्रभावित नहीं होते। ब्रह्म-संहिता (५.१) पुष्टि करती हैं—

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“श्रीकृष्ण जिन्हें गोविन्द कहा जाता है भगवान् हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक होता है। वे सबों के मूल स्रोत हैं। उनका अन्य स्रोत नहीं है और वे समस्त कारणों के कारण हैं।” यद्यपि वे समस्त कारणों के कारण हैं, तो भी वे परम (दिव्य) हैं और उनका रूप सच्चिदानन्द है। कृष्ण सभी वस्तुओं के आश्रय हैं और यही समस्त शास्त्रों का अभिमत है। इस दृश्य जगत का दूरस्थ कारण कृष्ण तथा निकटस्थ कारण प्रकृति है। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि प्रकृति को प्रत्येक वस्तु का कारण मानना वैसे ही है जैसे बकरी के गलस्तन को दूध का कारण मानना। यद्यपि भौतिक प्रकृति इस दृश्य जगत का निकटस्थ कारण है, किन्तु मूल कारण तो नारायण अथवा कृष्ण हैं। कुछ लोग मिट्टी के पात्र का कारण मिट्टी को मानते हैं। हम कुम्हार के चाक में प्रचुर मिट्टी देखते हैं जिससे अनेक पात्र बनाये जाने हैं और यद्यपि अल्पज्ञानी व्यक्ति कहेंगे कि पात्र का कारण चाक के ऊपर रखी मिट्टी है, किन्तु जो ज्ञान में बढ़े-चढ़े हैं, वे कुम्हार को आदि कारण मानते हैं, क्योंकि वही मिट्टी लाता है और चाक चलाता है। भले ही इस दृश्य जगत की उत्पत्ति में भौतिक प्रकृति सहायक कारक के रूप में हो, किन्तु वह परम कारण नहीं हैं। इसीलिए भगवद्गीता (९.१०) में भगवान् कहते हैं—मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्—“हे कुन्तीपुत्र! यह प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य करती है और समस्त चल तथा अचल प्राणियों को उत्पन्न करती है।”

परमेश्वर भौतिक शक्ति पर अपनी दृष्टि डालते हैं और इस चितवन से प्रकृति के तीनों गुण उद्वेलित होते हैं। फिर सृष्टि उत्पन्न होती है। निष्कर्ष यह हुआ कि प्रकृति इस भौतिक जगत का कारण नहीं है।

परमेश्वर ही समस्त कारणों के कारण हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥