श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां
कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् ।
स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाह-
मात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तेन—अत:; एकम्—एक; आत्मानम्—परमात्मा को; अशेष—अनन्त; देहिनाम्—जीवों का; कालम्—काल, समय; प्रधानम्—भौतिक कारण; पुरुषम्—परम पुरुष; पर-ईशम्—दिव्य नियन्ता; स्व-तेजसा—अपनी आध्यात्मिक शक्ति से; ध्वस्त—विलग; गुण-प्रवाहम्—भौतिक प्रवाह से; आत्म—आत्मा; एक-भावेन—एक के रूप में स्वीकार करने से; भजध्वम्—भक्ति में लगो; अद्धा—प्रत्यक्ष ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि परमेश्वर समस्त कारणों के कारण हैं, अत: वे समस्त जीवों के परमात्मा हैं और वे निकटवर्ती तथा सुदूर कारण हैं। चूँकि वे भौतिक प्रसर्जनों से विलग हैं, अत: वे उनकी अन्योन्य क्रियाओं से मुक्त हैं और प्रकृति के स्वामी हैं। अत: तुम्हें उनसे गुणात्मक रूप से अपने आपको अभिन्न मानते हुए उनकी सेवा करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 वैदिक परिगणनाओं के अनुसार सृष्टि के तीन कारण हैं—काल, अवयव तथा सृष्टिकर्ता। ये तीनों मिलकर त्रितयात्मक अर्थात् तीन कारण कहलाते हैं। इन्हीं तीन कारणों से इस संसार की सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। ये समस्त कारण भगवान् में पाये जाते हैं जैसाकि ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है—सर्वकारणकारणम्। इसीलिए नारद मुनि प्रचेताओं को प्रत्यक्ष कारण भगवान् की पूजा करने का उपदेश देते हैं। जैसाकि पहले कहा जा चुका है, वृक्ष की जड़ सींचने से वृक्ष के सारे अंग अनुप्राणित हो उठते हैं। नारद मुनि के उपदेशानुसार मनुष्य को सीधे भक्ति में लगना चाहिए। इसीमें
सारा पुण्यकर्म आ जाता है। चैतन्य-चरितामृत का कथन है—कृष्णे भक्ति कैले सर्व कर्मकृत हय—जब कोई भक्ति में परमेश्वर श्रीकृष्ण की पूजा करता है, तो वह स्वत: अन्य सारे पुण्यकर्म करता है। इस श्लोक में स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहम् पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवान् कभी भी भौतिक गुणों से प्रभावित नहीं होते, यद्यपि वे सब भगवान् की ही अध्यात्मिक शक्ति से नि:सृत होते हैं। जो लोग वास्तव में इस ज्ञान में निष्णात हैं, वे प्रत्येक वस्तु का उपयोग भगवान् की सेवा के लिए कर सकते हैं, क्योंकि इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसका सम्बन्ध भगवान् से न हो।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥