श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 29

 
श्लोक
विदुर उवाच
सोऽयमद्य महायोगिन् भवता करुणात्मना ।
दर्शितस्तमस: पारो यत्राकिञ्चनगो हरि: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
विदुर: उवाच—विदुर ने कहा; स:—वह; अयम्—यह; अद्य—आज; महा-योगिन्—हे महान् योगी; भवता—आपके द्वारा; करुण-आत्मना—अत्यन्त करुणामय; दर्शित:—मुझे दिखाया गया है; तमस:—अधंकार का; पार:—दूसरा छोर; यत्र—जहाँ; अकिञ्चन-ग:—भौतिक रूप से मुक्त व्यक्ति के द्वारा पहुँचने योग्य; हरि:—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीविदुर ने कहा : हे परम योगी, हे भक्तों में महान्, आपने अहैतुकी कृपा से मुझे इस अंधकार रूपी संसार से मोक्ष का पथ प्रदर्शित किया है। इस भौतिक संसार से मुक्त पुरुष इस पथ पर चल कर इस संसार से भगवान् के धाम को वापस जा सकता है।
 
तात्पर्य
 यह भौतिक संसार तम: या अंधकार कहलाता है और आध्यात्मिक जगत प्रकाश कहलाता है। वेदों का आदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति को अंधकार से निकल कर प्रकाश के साम्राज्य में जाने का प्रयास करना चाहिए। उस प्रकाश के साम्राज्य की जानकारी
स्वरूपसिद्ध व्यक्ति की कृपा से प्राप्त की जा सकती है। मनुष्य को भौतिक इच्छाओं का परित्याग भी करना होता है। इन इच्छाओं से छुटकारा पाते ही तथा मुक्त पुरुष की संगति पाने से भगवद्धाम जाने का मार्ग साफ हो जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥