श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 9

 
श्लोक
नारद उवाच
तज्जन्म तानि कर्माणि तदायुस्तन्मनो वच: ।
नृणां येन हि विश्वात्मा सेव्यते हरिरीश्वर: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद ने कहा; तत् जन्म—वही जन्म; तानि—वे; कर्माणि—कर्म; तत्—वही; आयु:—उम्र; तत्—वही; मन:—मन; वच:—वाणी; नृणाम्—मनुष्यों की; येन—जिससे; हि—निश्चय ही; विश्व-आत्मा—परमात्मा; सेव्यते—सेवित होता है; हरि:—भगवान्; ईश्वर:—परम नियन्ता ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि नारद ने कहा : जब कोई जीवात्मा परम नियन्ता भगवान् की भक्ति करने के लिए जन्म लेता है, तो उसका जन्म, उसके सारे सकाम कर्म, उसकी आयु, उसका मन तथा उसकी वाणी सभी यथार्थ में सिद्ध हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक का नृणाम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य-जन्म के अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के जन्म हैं, किन्तु नारद मुनि यहाँ पर मनुष्य-जन्म के विषय में विशेष रूप से कह रहे हैं। मनुष्यों में भी अनेक प्रकार के मनुष्य होते हैं। इनमें से जो मनुष्य आध्यात्मिक चेतना या कृष्णभक्ति में प्रगति कर चुके होते हैं, वे आर्य कहलाते हैं। इन आर्यों में से भी जो लोग भगवद्भक्ति में लगे रहते हैं उन का जीवन धन्य है। नृणाम् शब्द बताता है कि निम्न पशु भगवद्भक्ति नहीं कर सकते, किन्तु पूर्ण मानव समाज में प्रत्येक व्यक्ति को भगवद्भक्ति में लगना चाहिए। इसका कोई महत्त्व नहीं है कि वह निर्धन या धनी, श्वेत या काले परिवार में जन्मा है। मानव-समाज में जन्म लेने वाले व्यक्तियों में अनेक प्रकार की भौतिक भिन्नता हो सकती हैं, किन्तु सबों को भगवद्भक्ति करनी चाहिए। सम्प्रति सभ्य कहे जानेवाले राष्ट्रों ने आर्थिक विकास के फेर में ईश्वर-चेतना को त्याग रखा है। वे ईश्वर-चेतना को विकसित करने में तनिक भी रुचि नहीं रखते। पहले उनके पूर्वज धार्मिक नियमों को सम्पन्न करने में व्यस्त रहते थे। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, बौद्ध या यहूदी या अन्य कुछ, हर एक की कोई-न-कोई धार्मिक संस्था होती है। किन्तु वास्तविक धर्म का अर्थ है ईश्वर-भक्त (भगवद्भावनाभावित) होना। यहाँ इसका विशेष उल्लेख है कि यदि कृष्णभक्ति में रुचि रखी जाये तो जन्म सार्थक होता है। वही कर्म सफल है, जिससे भगवान् की सेवा हो सके। दार्शनिक चिन्तन या ज्ञान तभी सफल होता है जब उसे भगवान् को समझने में लगाया जाये। वे ही इन्द्रियाँ धन्य हैं, जो भगवान् की सेवा में लगी रहें। वास्तव में भक्ति का अर्थ है इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में लगाना। आज के समय में, हमारी इन्द्रियाँ शुद्ध नहीं हैं, इसीलिए वे समाज-सेवा, मित्रता, प्रेम, राजनीति इत्यादि में लगी रहती हैं। किन्तु जब ये इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा में लग जाती हैं, तो मनुष्य को भक्ति प्राप्त होती है। अगले श्लोक में इसकी विशद व्याख्या की गई है।
जब भगवान् चैतन्य महाप्रभु के एक महान् भक्त ने महाप्रभु को देखा तो उसने कहा कि उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो गईं “आज सभी कुछ शुभ है। आज मेरी जन्मभूमि तथा पास-पड़ोस पूर्णत: महिमामण्डित हो गये। आज मेरी सारी इन्द्रियाँ—आँखों से लेकर अँगूठे तक—भाग्यशाली हैं। आज मेरा जीवन सफल हुआ है, क्योंकि मैं उन चरणकमलों को देख सका जिनकी पूजा लक्ष्मी जी करती हैं।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥